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उपनिषद के अनुसार क्या हैं "मैं की वृत्ति" या अहं भाव का उदय ?PART-01

क्या हैं मैं की वृत्ति या अहं भाव का उदय ?-

05 FACTS;-

उपनिषद सूत्र..

'' 'लय को प्राप्त हुई वृत्तियां फिर से उत्पन्न न हों, वह उपरति की अवधि हैं।ऐसा स्थितप्रज्ञ यति सदा आनंद को पाता है। ’'

1-उपनिषद में कहा गया है कि अहं भाव न पैदा हो।कारण कोई भी हो लेकिन जब तक अहं भाव पैदा हो या ऐसा लगे कि मैं कुछ हो गया, तब तक जानना कि अभी ज्ञान में फूल नहीं खिले, ज्ञान का विस्फोट नहीं हुआ। उपनिषद के ऋषि परमात्मा तक के दर्शन की बात को ज्ञान की परम अवधि नहीं कहते। वे कहते हैं कि जब आपके सब चक्र खुल जाएं और कुंडलिनी जाग्रत हो जाए और सहस्र दल कमल खिल जाए तो ज्ञान की परम अवधि समझना।आप सातों स्वर्ग चढ़ जाएं और सारे चौदह खंडों की यात्रा पूरी हो जाए, तो भी उपनिषद कहते हैं कि इस सबसे कोई मतलब नहीं है। कसौटी की बात एक ही है कि अहं

भाव का उदय न हो।वास्तव में,कुंडलिनी से भी अहं भाव का उदय होता है। साधक को लगता है कि हमारी कुंडलिनी जाग्रत हो गई ..अब हम कोई साधारण व्यक्ति नहीं है।किसी को लगता है कि हमारा आज्ञाचक्र जग गया, ज्योति के दर्शन होने लगे, हम कोई साधारण नहीं है।किसी को लगता है कि हृदय में नीलमणि प्रकट हो गई, नीली ज्योति दिखाई पड़ने लगी, अब हम मुक्त हो गए, अब हमारे लिए कोई संसार नहीं! ध्यान रहे, जिस किसी से भी 'मैं 'निर्मित होता हो वह अज्ञान का ही हिस्सा है, चाहे आप कुछ भी नाम देते चले जाएं।

2- यह भी हो सकता है कि कोई साधारण व्यक्ति जिसकी न कुंडलिनी जगी हो, और न जिसने नील ज्योति देखी हो, और न चौदह खंडों की यात्रा की हो ..कुछ भी न किया हो। लेकिन वह ऑफिस पर बैठ कर अपना काम कर रहा हो ..अहं भाव न

जगा हो, तो वह भी ज्ञान की परम अवधि को पहुंच जायेगा ।और हिमालय के ऊंचे शिखर पर खड़ा बडा योगी हो, परन्तु जितना हिमालय का ऊंचा शिखर हो, उतना ही भीतर अहंकार का भी शिखर हो।वह सोचता हो कि मैं पहुंच गया और कोई नहीं पहुंचा;मैंने पा लिया और किसी ने नहीं पाया ..तो समझना कि अभी ज्ञान की घटना नहीं घटी है। एक ही कसौटी है कि भीतर ऐसी घड़ी आ जाए , कि कोई भी अहं भाव को निर्मित न कर पाए। कुछ भी होता रहे या खुद परमात्मा भी सामने आकर खड़ा हो जाए ..तो भी यह भाव पैदा न हो कि मेरे अहोभाग्य, मैंने पा लिया परमात्मा को भी! यह परमात्मा सामने खड़े हैं, और दर्शन हो रहा है।

3- मन बड़ा कुशल है, और हर चीज में से अहं भाव को निकाल लेता है; वह इतना कुशल है कि विनम्रता तक में से अहं भाव को निकाल लेता है कि एक व्यक्ति कहने लगता है कि मुझसे ज्यादा विनम्र और कोई भी नहीं! वह कुछ भी हो ..चाहे धन हो, चाहे यश हो, चाहे पद हो, चाहे शान हो, चाहे मुक्ति हो, चाहे विनम्रता हो ..मुझसे ज्यादा कोई भी नहीं। वह जो मैं है, निर्मित

होता चला जाता है।तो हमेशा भीतर जांचते रहना है, खोजते रहना है, नहीं तो आध्यात्मिक तलाश भी सांसारिक तलाश हो जाती है। आध्यात्मिक और सांसारिक खोज में वस्तुओं का भेद नहीं है, केवल अहंकार का भेद है। एक व्यक्ति संसार में धन के ढेर लगा लेता है तो अहंकार मजबूत होता है। एक दूसरा व्यक्ति सारे धन का त्याग कर देता है और त्याग से अहंकार को मजबूत कर लेता है। दोनों की यात्रा सांसारिक है। आध्यात्मिक यात्रा तो शुरू ही होती है अहंकार के विसर्जन से। एक ही त्याग है करने जैसा, और वह है 'मैं का त्याग' । बाकी सब त्याग फिजूल हैं, क्योंकि उन त्याग से भी 'मैं' आ जाता है।

4- उदाहरण के लिए कोई कहता है कि चौदह साल से मैंने अन्न नहीं लिया और उनकी अकड़ देखने लायक है। अन्न लेने से भी इतनी अकड़ पैदा नहीं होती, जितनी उनको अन्न न लेने से पैदा हो गई है! तो यह अन्न का न लेना तो जहर हो गया। वे इसको बताते फिर रहे हैं कि चौदह साल से अन्न नहीं लिया ...अब यही अहंकार बन रहा है।कोई कहता है कि हम वर्षों से दूध ही ले

रहे हैं ! दूध उनके लिए जहर मालूम हो रहा है क्योंकि वे जमीन पर नहीं चल रहे हैं ...कौन सी बड़ी क्रांति हुई जा रही है कि

दूध ले रहे हैं?मगर उसका कारण है। क्योंकि उन्हें लगता है, वे कुछ विशेष कर रहे हैं जो दूसरे नहीं कर रहे हैं। बस जहां विशेष का खयाल आया, वहां अहंकार निर्मित होना शुरू हो जाता है।आप अपने लिए किसी भी कारण से विशिष्टता पैदा कर लें , तो अहंकार निर्मित होता है।

5-तो साधक का अर्थ हुआ कि अपने भीतर से विशेषता पैदा करना बंद करता जाए; धीरे धीरे इतना सामान्य हो जाए कि भीतर यह भाव ही पैदा न हो कि मैं भी कुछ हूं; 'ना कुछ' हो जाए। जिस दिन साधक 'ना कुछ' हो जाता है,उसी दिन ज्ञान की परम अवधि आ जाती है।परम अवधि ज्ञान के संग्रह से नहीं, बल्कि अहंकार के विसर्जन से;मैं की मृत्यु से आती है।परन्तु लय को प्राप्त हुई वृत्तियां फिर से उत्पन्न न हों।बहुत बार वृत्तियां लय हो जाती हैं ;लेकिन वह लय होना, वापस लौट आता है। एक दिन लगता है कि मन बिलकुल शांत हो गया, दूसरे दिन फिर अशांत हो जाता है। एक दिन लगता है बड़ा आनंद है, दूसरे दिन फिर दुख में घिर जाते हैं।

क्या अर्थ हैं कि 'लय को प्राप्त हुई वृत्तियां फिर से उत्पन्न न हों, वह उपरति की अवधि हैं '?

05 FACTS;-

1-मन के कुछ नियम हैं कि वह सतत एक जैसा कभी नहीं रहता, परिवर्तन उसका स्वभाव है। तो जो शांति मिले और खो जाए, समझना कि वह आध्यात्मिक शांति नहीं है, मन की ही शांति थी । जो आनंद मिले और खो जाए, तो समझना कि वह आध्यात्मिक आनंद न था, मन का ही आनंद था। जो भी बने और बिखर जाए, जो आए और चला जाए, वह मन का है। जो आए और फिर कभी न जाए; जो आए तो बस आ जाए, और जाने का कोई उपाय न रहे; आप चेष्टा भी करें और उसे हटा न पाएं। मन में शांति आ जाए, तो लाख चेष्टा के बावजूद बदलेगी ही, और आत्मिक शांति आ जाए, तो आप उसे नष्ट करने की लाख चेष्टा करें, तो भी आप नष्ट नहीं कर सकते, वह बनी ही रहेगी। मन में ..प्रयास से भी सतत नहीं रह सकता, और आत्मा में.. प्रयास से भी सतत तोड़ा नहीं जा सकता।

2-जब वृत्तियां उठनी बंद हो जाएं, तो जल्दी मत करना,और यह मत सोच लेना कि पहुंच गए। प्रतीक्षा करना कि वे दुबारा तो नहीं उठती हैं। अगर दुबारा उठती हैं तो समझना कि अभी मन के तल पर ही काम चल रहा है। और मन की शांति का मूल्य नहीं है ;वह तो आएगी और चली जाएगी और फिर अशांति आ जाएगी। मन में तो प्रतिपल विपरीत की तरफ गति होती रहती है। जब आप अशांत होते हैं तो मन शांति की तरफ गति करता है, और जब शांत होते हैं तो अशांति की तरफ गति करता है। मन द्वंद्व है। इसलिए विपरीत हमेशा मौजूद रहेगा और गति करता रहेगा।परन्तु कैसे अनुभव करेंगे कि जो हो रहा है वह मन

का है ?वास्तव में, एक बुनियादी भेद है।अगर मन शांत हो और भीतर के तल पर शांति न पहुंची हो ...तो शांत होते ही एक डर पैदा हो जाएगा कि यह शांति बनी रहे, मिट न जाए। अगर यह वासना पैदा हो तो समझना कि यह मन का मामला है, क्योंकि मिटने का डर मन में ही होता है। शांति आ जाए और यह डर न आए कि मिट तो नहीं जाएगी, तो समझना कि यह मन की नहीं है।

3-दसरी बात मन हर चीज से ऊब जाता है ; दुख से ही नहीं, बल्कि सुख से भी ऊब जाता है। यह मन का यह दूसरा नियम है कि मन किसी भी स्थिर चीज से ऊब जाता है। अगर आप दुख में हैं तो दुख से ऊबा रहता है और कहता है सुख चाहिए। पर आपको पता नहीं है कि यह मन का नियम है कि सुख मिल जाए, तो सुख से ऊब जाता है। और तब भीतरी दुख की मांग करने लगता है।अगर शांति भी थोड़े दिन ठहर जाए, तो वे बेचैन होने लगते हैं, क्योंकि उससे भी ऊब पैदा होती है।

मन हर चीज से ऊब जाता है। मन सदा नए की मांग करता रहता है। नए की मांग से ही सब समस्याएं पैदा होती है। मन के बाहर आत्मिक तल पर नए की कोई मांग नहीं है; पुराने की कोई ऊब नहीं है : जो है, उसमें इतनी लीनता है, कि उसके अतिरिक्त किसी की कोई चाह नहीं है।

4-सूत्र कहता है कि लय को प्राप्त हुई वृत्तियां फिर से उत्पन्न न हों, तो उपरति की अवधि है ;तो समझना कि विश्राम मिला। वे

पुनः- पुनःपैदा होती रहें, तो समझना कि सब मन का ही जाल है।क्योंकि मन के साथ हमारा इतना गहरा संबंध है कि हम मन की ही शांति को अपनी शांति समझ लेते हैं। उससे बड़ा कष्ट होता है क्योंकि वह खो जाती है।इसीलिए साक्षी के सूत्र का प्रयोग करना उपयोगी है। इससे मन के बाहर जाने का रास्ता बनता है और परम उपरति उपलब्ध होती है।वास्तव में,जब मन अशांत

होता है तो हम उससे हटना चाहते हैं, और जब मन शांत होता है तो हम उससे जुड़ना चाहते हैं। शांति को हम बचा रखना चाहते हैं, अशांति को हटाना चाहते हैं। जब मन दुखी होता है, तो हम मन को फेंक देना चाहते हैं कि इससे फुरसत हो जाए और जब मन सुखी होता है, तो हम उसका आलिंगन कर लेते हैं और उसको बचा लेना चाहते हैं। तब तो आप मन से कभी न छूट पाएंगे, क्योंकि यही तो मन की व्यवस्था है कि दुख से छूटो, सुख को पकड़ो।

5-मन से छूटने का उपाय यह है कि जब मन सुख दे रहा हो, तब भी साक्षी बने रहना और उसको पकड़ना मत। जैसे आप ध्यान करते हैं,तो ध्यान में कभी अचानक शांति का झरना फूट पड़ेगा। उस वक्त उसको आलिंगन मत कर लेना,दूर खड़े देखते रहना , कि शांति घट रही है, मैं साक्षी हूं। किसी क्षण,सुख का झरना टूट पड़े तो उसको भी दूर खड़े होकर ही देखते रहना।उसको पकड़ मत लेना कि मुक्ति आ गई , उसको केवल खड़े होकर साक्षी भाव से देखते रहना, कि मन में सुख घट रहा है, पकडूगां नहीं।सच्चाई यह है कि जो सुख को नहीं पकड़ता, उसके दुख समाप्त हो जाते हैं;जो शांति को नहीं पकड़ता,

उसकी अशांति सदा के लिए मिट जाती है। शांति को पकड़ने में ही अशांति का बीजारोपण है, और सुख को पकड़ने में ही दुख का जन्म है। तो पकड़ना ही मत क्योकि पकड़/क्लिगिंग का नाम ही मन है।खुली मुट्ठी से आप मन के पार हट जाएंगे और उसमें प्रवेश हो जाएगा, जहां से फिर वृत्तियां दुबारा जन्म नहीं पातीं; परम लय हो जाता है। उस परम लय को ही 'उपरति,'... विश्राम कहा जाता है।

क्या अर्थ हैं कि ‘ऐसा स्थितप्रज्ञ यति सदा आनंद को पाता है’?

05 FACTS;-

1-''लय को प्राप्त हुई वृत्तियां फिर से उत्पन्न न हों, वह उपरति की अवधि हैं। ऐसा स्थितप्रज्ञ यति सदा आनंद को पाता है’'।स्थितप्रज्ञ का अर्थ है ...जिसकी प्रज्ञा अपने में ठहर गई, जिसका बोध अपने में रुक गया, जिसकी चेतना स्वयं को छोड़ कर कहीं भी नहीं जाती।जिसकी चेतना ठहर गई, ऐसा यति/संन्यासी, ऐसा साधक सदा आनंद को पाता रहता है।मन के तल

पर है सुख और दुख, द्वंद्व; शांति -अशांति,अच्छा-बुरा, जन्म -मृत्यु । मन के पीछे हटते ही निर्द्वंद्व है, आनंद है। आनंद के विपरीत कोई शब्द नहीं है, वह द्वंद्व के बाहर है। और जो द्वंद्व के बाहर है, ऐसा यति सदा आनंद को पाता रहता है।

हमारी तकलीफ यह है कि आनंद तो हम भी पाना चाहते हैं और इस तरह की बातें सुन कर हमारा लोभ जागता है कि अगर आनंद सदा मिले, तो कोई रास्ता बता दे, ताकि हम भी सदा आनंद को पा लें।

2-लेकिन ध्यान रखना, यह परिभाषा केवल स्थिति सूचक है। अगर इससे वासना का जन्म होता है तो आप इस स्थिति को कभी न पाएंगे। इसका फर्क ठीक से समझ लें।कोई कहता है कि जल्दी से मुक्ति हो जाए; ध्यान लग जाए; समाधि

आ जाए ...जल्दी से! वास्तव में,जितनी जल्दी करिएगा, उतनी देर हो जाएगी। क्योंकि जल्दी करने वाला मन शांत हो ही नहीं

सकता। जल्दी ही तो अशांति है।और हम सब अनुभव करते हैं कि कभी -कभी जल्दी में कैसी मुश्किल हो जाती है। ट्रेन पकड़नी है और जल्दी में हैं ;तो जो काम दो मिनट में हो सकता था वह पांच मिनट लेता है! कोट के बटन उलटे लग जाते हैं! फिर खोलो, फिर लगाओ। चश्मा हाथ में उठाते हैं, छूट जाता है, टूट जाता है! चाबी बंद कर रहे हैं सूटकेस की, चाबी ताले में ही नहीं जाती! जल्दी में तो निरंतर ही देर हो जाती है। क्योंकि जल्दी का मतलब यह है कि चित्त बहुत अस्तव्यस्त है, और भूल- चूक हो जाएगी। तो जब छोटी -छोटी चीजों में जल्दी देर करवा देती है, तो इस विराट की यात्रा पर तो जल्दी बहुत देर करवा

देगी। यहां तो तैयारी रखो कि अनंत काल में कभी भी हो जाएगा तो हम राजी हैं, कोई जल्दी नहीं, तो शायद जल्दी भी हो जाए।

3-यहां मन दिक्कत देता है। कोई अनंत काल के लिए भी तैयार हैं ..लेकिन जल्दी के लिए ही यह भी उपयोग कर रहा हैं। अब इस बात को कैसे समझाया जाए क्योकि वह प्रतीक्षा करने को भी राजी हैं।अगर आप अनंत प्रतीक्षा करेंगे, तो

जल्दी परिणाम है, लेकिन आप जल्दी की वासना नहीं बना सकते। इस फर्क को समझ लें। अगर आप प्रतीक्षा करने को तैयार हैं तो जल्दी होगी, लेकिन वह प्रतीक्षा करने वाले चित्त का परिणाम है। अगर आप कहते हैं कि इसीलिए हम प्रतीक्षा करेंगे कि जल्दी हो जाए, तो आप प्रतीक्षा कर ही नहीं रहे, और जल्दी कभी नहीं होगी। जल्दी की वासना से प्रतीक्षा कैसे निकल सकती है? यही तकलीफ है। हम सबको लगता है कि आनंद तो हमें भी चाहिए ..तो हम कैसे आनंद को पा लें! आनंद को पा लेने का जो विचार और वासना है, वही तो आनंद के लिए बाधा है। आनंद परिणाम है ;उसको आप वासना मत बनाएं। आप चुपचाप मौन यात्रा करते जाएं, तो वह घटेगा।

4-इसलिए बड़ी कठिनाई घटती है कि इन सूत्रों को पढ़ कर अनेक लोग आनंद की वासना से ग्रस्त हो जाते हैं जबकि ये सूत्र वासनामुक्ति के लिए हैं। और नई वासना पकड़ लेती है कि 'कैसे आनंद मिले'? कैसे हो जाएं स्थितप्रज्ञ? कैसे आ जाए उपरति? कैसे आ जाए वैराग्य? और तब वे हैं जन्मों -जन्मों तक दौड़ते रहते और यह घटना उनके जीवन में कभी नहीं घटती। तब उन्हें संदेह होने लगता है कि कहीं ये सब बातें झूठी तो नहीं हैं, क्योंकि कहा तो था कि आनंद आ जाएगा, वह अभी तक

नहीं आया!आज लोग ज्यादा से ज्यादा अधार्मिक होते चले जाते हैं और उनकी निष्ठा धर्म पर कम होती चली जाती है और कारण इस सूत्र में है। आप में से हर एक ने आनंद की, मोक्ष की, परमात्मा की कई जन्मों में वासना कर ली है और आनंद नहीं मिला, मोक्ष नहीं मिला, परमात्मा नहीं मिला। उसका जो परिणाम होना था, वह हो गया है। वह परिणाम यह हुआ है कि अब आपको लगता है कि ये कोई मिलने वाली चीजें ही नहीं हैं। आपकी वासना निष्फल चली गई। इन सूत्रों पर से भरोसा उठ गया है।

5-हजारो साल से ये सूत्र मनुष्य को पता हैं। पृथ्वी पर सभी लोगों ने करीब करीब, इस आनंद की कामना कर ली है, इसके लिए प्रयास कर लिए हैं। कभी ध्यान किया, कभी योग किया, कभी तंत्र साधना , कभी मंत्र साधना ..सब कर चुके हैं। किसी न किसी जन्म में सभी कुछ न कुछ न कर चुके हैं ;साधना के पथ पर चल चुके है ..लेकिन कामनाग्रस्त होकर। उस कामना के कारण ही साधना निष्फल चली गई है, और भीतर गहरी चेतना में वह असफलता बैठ गई है। उसका कारण है कि सारी दुनिया में अधर्म बढ़ता हुआ दिखाई पड़ता है। क्योंकि अधिक लोगों के लिए धर्म असफल हो गया है।आपको याद भी नहीं है,

लेकिन आप अपने भीतर धर्म को असफल कर चुके है। और कारण भी आप ही हैं। क्योंकि आपने, जिसकी कामना/वासना नहीं की जा सकती, उसकी वासना करके भूल कर ली है।आप साधना से गुजरेंगे तो ये परिणाम घटते हैं। इनकी आपको चिंता नहीं करनी है, न इनका विचार करना है, और न इनकी आकांक्षा करनी है, और न ही जल्दी करनी है कि ये घट जाएं। उस जल्दी से ही सब विपरीत हो जाता है।

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क्या दुनिया में अधर्म तब तक बढ़ता ही चला जाएगा, जब तक हम धर्म की भी वासना करेंगे ?-

CONTD,

..SHIVOHAM..