Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

आदिशंकर-03

र्क और विवाद, तर्क और खंडन से न तो कभी कोई संवाद हुआ है, न हो सकता है।

संवाद का अर्थ है: दो हृदयों की बातचीत; विवाद से अर्थ है: दो बुद्धियों का टकराव।

संवाद का अर्थ है: दो व्यक्तियों का मिलन; विवाद से अर्थ है: दो व्यक्तियों का संघर्ष।

संवाद में कोई हारता नहीं, दोनों जीत जाते हैं; विवाद में कोई जीतता नहीं, दोनों हार जाते हैं।

लेकिन मजबूरी थी और शंकर को विवाद करना पड़ा; क्योंकि विवाद के पूर्व संवाद का कोई उपाय ही न था। शंकर ने सत्य को समझाने के लिए विवाद नहीं किया। लेकिन लोग अपनी बुद्धियों में, अपने अहंकारों में, अपने पांडित्य में इस भांति भरे थे कि जब तक उनका पांडित्य तोड़ा न जाए, उनकी बुद्धि पराजित न हो, वे धूल-धूसरित होकर गिरें न, तब तक वे हृदय की बात सुनने को राजी भी न थे। तो शंकर ने विवाद से उन्हें सत्य नहीं समझाया, विवाद से केवल उनके अहंकार को झुकाया। और जो झुकने को राजी हो जाए, उससे फिर संवाद हो सकता है।

शंकर का शास्त्रार्थ तो केवल निषेधात्मक था; वह तो एक लगे कांटे को दूसरे कांटे से निकालना था। तर्क से भरे हुए मन हैं, वे केवल तर्क की भाषा ही समझते हैं। पांडित्य से भरा हुआ मन केवल पांडित्य की भाषा समझता है; प्रेम की भाषा उसे सुनाई भी नहीं पड़ती। सुनाई भी पड़े तो उसमें कोई अर्थ नहीं मालूम होता। और मौन की भाषा का तो कोई सवाल ही नहीं है।

शंकर जब पैदा हुए, तब इस देश का पांडित्य अपने शिखर पर था। उसी पांडित्य ने इस देश को बर्बाद भी किया। यह देश खोपड़ी में अटक गया; और हृदय तक जाने के इसके द्वार बंद हो गए। गर्दनें काटनी जरूरी थीं, अन्यथा हृदय तक आने का कोई उपाय न था। और बीमारी इतनी भयंकर हो गई थी कि औषधि काम नहीं कर सकती थी; शल्य-चिकित्सा जरूरी थी, आपरेशन जरूरी था; काटे बिना कोई उपाय न था। मलहम-पट्टी से इलाज होने वाला न था। बीमारी काफी दूर आगे निकल जा चुकी थी।


तो शंकर को विवाद करना पड़ा; वह मजबूरी थी। शंकर विवादी नहीं हैं। शंकर और विवादी हों, यह संभव ही नहीं है। शंकर का रस तर्क में नहीं है, अन्यथा वे भज गोविन्दम् जैसा गीत न गाएं। उनके प्राण तो भजन गाने को बने थे। शंकर को ठीक अवसर मिलता तो वे नाचते; समय परिपक्व होता, लोग हृदय की भाषा समझते, तो शंकर ने तर्क किया ही न होता। लेकिन देश बीमार था; पांडित्य अपनी आखिरी अवस्था में था; लोगों के सिर भारी थे; उनका बोझ उतारना जरूरी था। और पंडित केवल तर्क ही समझ सकता था। तर्क से पराजित हो, तर्क से हारे, तो शायद राजी हो हृदय की भाषा सुनने को। झुकाया शंकर ने लोगों को।

और ध्यान रखना, जिसने सत्य को जाना हो, वह तर्क का भी उपयोग कर सकता है–हितकर दिशा में। जिसने सत्य को न जाना हो, उसके हाथ में तो तर्क का उपयोग खतरनाक है। जिसने सत्य को न जाना हो, उसके लिए तर्क ही सब कुछ हो जाता है–साध्य। जिसने सत्य को जाना हो, वह तर्क को भी सत्य की सेवा में संलग्न कर देता है। जिसने सत्य को जाना हो, वह तर्क को अनुचर बना लेता है। सत्य तर्क पर भी सवारी कर सकता है। साधारणतया तर्क छोटे बच्चों के हाथ में पड़ गई तलवार है। उससे वे दूसरों को भी नुकसान पहुंचा देते हैं और अंततः अपने को भी नुकसान पहुंचाएंगे। लेकिन ज्ञानी के हाथ में तर्क, समझदार के हाथ में तलवार है; उससे किसी को नुकसान न पहुंचेगा। हां, दुर्घटना के क्षणों में किसी की रक्षा हो सकती है।

शंकर ने तर्क का सम्यक उपयोग किया। जहर भी औषधि बन जाता है समझदार के हाथ में। जहर जहर नहीं है, अगर समझदारी हो; तो उसका भी उपयोग हो सकता है। और शंकर ने बहुमूल्य उपयोग किया। देश में एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक वे घूमे। और जहां-जहां उन्हें लगा कि कोई रुग्ण चित्त बुद्धि में अटक गया है और हृदय की भाषा विस्मृत हो गई है, जहां-जहां उन्हें लगा कोई प्रतिभा शब्दों में उलझ गई है और शून्य के फूल तक पहुंचने का द्वार बंद हो गया है, जहां-जहां उन्हें लगा कि कोई शास्त्र में दब गया है और छटपटा रहा है, वहीं-वहीं उन्होंने विवाद किया, तर्क का उपयोग किया, शास्त्रार्थ किया। यह सिर्फ भूमिका है।

जैसे ही कोई शास्त्रार्थ में हारा, वैसे ही शंकर ने उसे शिष्यत्व में नियोजित किया। वह दूसरी बात मूल्यवान है; असली बात वही है। तर्क में जैसे ही कोई हारा, उसकी हार का उन्होंने उपयोग कर लिया। उस हार के क्षण में जब अहंकार बिखरा, चौंका व्यक्ति, तर्क काम न आए, बुद्धि ने साथ न दिया, असहाय हुआ, डूबने लगा, शंकर ने दूसरी नाव सामने कर दी–कि तर्क की नाव डूबती है, डूबने दो; मेरे पास और भी नाव है–हृदय की नाव, प्रेम की, भक्ति की। ऐसे ही क्षणों में उन्होंने गाया होगा–भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम् मूढ़मते।

यह ‘मूढ़’ पंडितों से ही कहा है उन्होंने। अगर तुम ठीक से समझो तो शास्त्रार्थ किया, ताकि तुम्हारी मूढ़ता काटी जा सके। कटते ही, भ्रम टूटते ही, उस संधि का उन्होंने उपयोग कर लिया–जब तुम क्षण भर को निर्भार होते हो, और जब तुम्हें खुला आकाश दिखाई पड़ता है, बादल हट गए होते हैं–उसका उन्होंने उपयोग कर लिया। शंकर ने विवाद से सत्य को नहीं समझाया, विवाद से केवल बादल छांटे, हटाए, ताकि सत्य का सूरज दिखाई पड़ सके।

सत्य को तो सिद्ध करने की कोई जरूरत ही नहीं है, सत्य तो स्वयंसिद्ध है। और ध्यान रखना, जिसे सिद्ध करना पड़े तर्क से, उसे तर्क से ही असिद्ध भी किया जा सकता है। तर्क का कोई बल थोड़े ही है, तर्क तो खेल है। ऐसी कोई भी चीज नहीं जो तर्क से सिद्ध की गई हो और तर्क से ही तोड़ी न जा सके। तर्क तो वकील है, तर्क तो वेश्या है; उसका किसी से कुछ लगाव नहीं है; वह तो दोनों तरफ हो सकता है। कोई भी तर्क ले लें, वह अपने विपरीत भी उतना ही बलशाली है।

तलवार को कोई प्रयोजन थोड़े ही होता है कि किसके हाथ में है। किसी के हाथ में हो! जिसके हाथ में हो, वहीं से काटती है। तुम्हारी तलवार भी दुश्मन के हाथ में पड़ कर तुम्हारी गर्दन को काट सकती है। तुम यह न कह सकोगे कि मेरी तलवार और मुझे ही काटती है! तलवार किसी की नहीं है। तर्क भी किसी का नहीं है। इसलिए तर्क पर जिन्होंने भरोसा किया, एक न एक दिन वे पाएंगे कि कागज की नाव में सवार थे; एक न एक दिन वे पाएंगे कि जिस तर्क के सहारे खड़े थे, उसी तर्क ने गिराया।

तुम अगर मानते हो ईश्वर को, तो तुम कहते हो, कोई बनाने वाला होना चाहिए संसार का। यह तुम्हारा तर्क है कि बिना बनाए संसार कैसे बनेगा! नास्तिक पूछता है, परमात्मा को किसने बनाया? तर्क उसका भी वही है। तुम कहते हो, बिना बने संसार कैसे बनेगा, इसलिए परमात्मा होना चाहिए। वह कहता है, फिर परमात्मा को किसने बनाया? क्योंकि बिना बनाए परमात्मा भी कैसे हो सकता है! वही पूछ रहा है, कुछ भेद नहीं है तुम्हारे-उसके तर्क में। तुम आस्तिक मालूम पड़ते हो, वह नास्तिक मालूम पड़ता है। मेरे देखे, दोनों समान हैं; क्योंकि दोनों का भरोसा एक ही तर्क पर है; और वह तर्क यह है कि कोई चीज बिना बनाए कैसे हो सकती है!

नास्तिक से तुम नाराज हो जाते हो; तुम कहते हो–चुप रहो! परमात्मा को किसी ने भी नहीं बनाया। नास्तिक यही कहता है, जब परमात्मा को किसी के बिना बनाए बनने की सुविधा है, तो संसार को बिना बनाए बनने की सुविधा क्यों नहीं है? तर्क वही है। नास्तिक-आस्तिक में इसलिए कोई भी जीत नहीं पाता। जीतोगे कैसे? तुम दोनों के तर्क समान हैं।

तर्क से कभी कुछ सिद्ध नहीं होता। जो है, वह अतक्र्य है; जो है, वह सिद्ध ही है; वह सेल्फ-इविडेंट है, स्वयंसिद्ध है।

लेकिन अगर तुम तर्क लेकर शंकर के पास जाओगे, तो शंकर तुम्हारा तर्क काटने को तैयार हैं। शंकर जैसे तर्कनिष्ठ लोग कम ही हुए हैं। तुम्हें ऐसे लोग तो मिल जाएंगे, जिन्होंने परमात्मा को जाना–रामकृष्ण–लेकिन तुम्हें ऐसे लोग बहुत मुश्किल से मिलेंगे, जिन्होंने परमात्मा को जाना और जो नास्तिक के तर्कों को भी तोड़ सकते हों। रामकृष्ण नास्तिक का तर्क नहीं तोड़ सकते। तर्क के जगत में उनकी कोई गति नहीं है। वे सीधे, शुद्ध भाव के व्यक्ति हैं। विवेकानंद तोड़ सकते हैं; लेकिन विवेकानंद को सत्य का कोई अनुभव नहीं है। शंकर ऐसे हैं, जैसे रामकृष्ण और विवेकानंद एक साथ–एक ही व्यक्तित्व में। उन्होंने जाना है, जैसा रामकृष्ण ने जाना; और जो उन्होंने जाना है, उसके पक्ष में वे सारे तर्क संयोजित कर सकते हैं, जो विवेकानंद कर सकते हैं बिना जाने। शंकर जैसे व्यक्ति अनूठे हैं।

पर ध्यान रखना, शंकर को समझने में भूल हो गई है। जिन पंडितों को तोड़ने में शंकर ने जीवन भर श्रम किया, उन्हीं पंडितों ने शंकर को भी पंडित समझ लिया है। वे पंडित यही कहे चले जाते हैं कि शंकर ने दिग्विजय की। शंकर सुनते होंगे तो हंसते होंगे।

तर्क की जीत भी कोई जीत है? किसी को तर्क से हराना भी कोई हराना है? क्योंकि तर्क से हारा हुआ चुप हो जाता है, हारता नहीं है, ध्यान रखना। तुम किसी के सामने बड़े तर्क खड़े कर दो तो हो सकता है वह उतने बड़े तर्क न जुटा पाए, तो वह चुप हो जाता है। लेकिन वह भीतर-भीतर कहता है, ठहरो, खोजेंगे कोई उपाय। तर्क से हराना ऐसा ही है, जैसे किसी की छाती पर तलवार रख दो और वह झुक जाए। लेकिन भीतर? भीतर तो अड़ा ही रहेगा। प्रतीक्षा करेगा उचित, अनुकूल समय की–जब तुम्हारी छाती पर तलवार रख दे।

तलवार से हारा हुआ कहीं हारता है? सिर्फ प्रेम से हारा हुआ हारता है। क्योंकि जब तक भीतर न झुक जाए हृदय, तब तक सब झुकना व्यर्थ है।

तो शंकर ने तर्क से तो केवल तर्क ही काटा; जो तर्क से जी रहे थे, उनको तर्क से पराजित किया। लेकिन उस पराजय के क्षण में शंकर ने बता दिया कि तुम्हारे तर्क भी व्यर्थ हैं, मेरे भी व्यर्थ हैं; तुम्हें कांटा लगा था, इसलिए मैंने कांटे से कांटा निकाल दिया; मेरा कांटा तुमसे ज्यादा मूल्यवान नहीं है। और भूल कर भी मेरे कांटे को अपने घाव में मत रख लेना, अन्यथा यह भी उतनी ही पीड़ा देगा जितना तुम्हारा कांटा दे रहा था। कांटा भी कोई मेरात्तुम्हारा होता है? दोनों को फेंक दो।

यही था उनका शिष्यत्व: बुद्धि से हट जाओ, भाव के निकट आओ। सत्य को खोजना है विचार करके नहीं; सत्य को खोजना है भावना से। सत्य को खोजना है–तर्क, शास्त्र, सिद्धांत से नहीं; सत्य को खोजना है हृदय को खोल कर। हृदय का फूल जब खिलता है, तो सत्य का सूर्य उस पर चमकता है; खिले हुए हृदय के फूल पर सत्य की किरणें नाचती हैं। शिष्यत्व का यही अर्थ था। लेकिन जो और तरह से न समझ सकते थे, शंकर ने उन्हें उनकी ही भाषा में समझाया।

शंकर अनूठे व्यक्ति हैं। और अनूठे व्यक्तियों के संबंध में नासमझी बहुत आसान है; क्योंकि वे तुम्हारी समझ की सामान्य कोटियों के पार पड़ते हैं। लोगों को लगा कि ये भी तार्किक हैं, महातार्किक हैं। लेकिन महातार्किक कहेगा, भज गोविन्दम्? कि नाचो-गाओ? परमात्मा का गीत गाओ–तार्किक कहेगा? महातार्किक कहेगा? संभव नहीं है। यह तो बड़े ही गहन हृदय से उठी हुई वाणी है। यह तो कोई परमात्मा का प्रेमी कह सकता है, तार्किक नहीं। इसे स्मरण रखो।

‘आपने बहुत बार कहा कि तर्क और विवाद से कभी संवाद संभव नहीं होता।’

कभी संभव नहीं होता। तर्क और विवाद से शंकर ने संवाद की भूमि साफ की। तुम विवाद से भरे थे, विवाद से गिराया; तुम तर्क से भरे थे, तर्क से तोड़ा। इससे केवल भूमि को साफ करना है। फिर भाव के, भक्ति के बीज बोए।

अनेक लोगों को यह विचार उठता रहा है कि शंकर विरोधाभासी हैं। विरोधाभासी नहीं हैं। विरोधाभासी ऐसे ही लगते हैं, जैसे कि तुम्हारे पड़ोस में कोई आदमी अपना मकान गिरा रहा हो। तो एक दिन तुम देखते हो कि वह मकान गिराने में लगा है। महीनों मेहनत करके मकान गिराता है, कूड़ा-कबाड़ साफ करता है, भूमि तैयार करता है। फिर नींव भरता है और मकान उठाने लगता है। क्या तुम कहोगे यह आदमी विरोधाभासी है? एक दिन मकान तोड़ता है, दूसरे दिन बनाता है! विरोधाभासी तो है–लेकिन क्या तुम कहोगे यह विरोधाभासी है? नहीं, क्योंकि तुम जानते हो, नया मकान बनाना हो तो पुराना गिराना पड़ता है। इस विरोध में भी विरोध नहीं है। पुराने मकान को गिरा कर ही नया मकान बन सकता है।

शंकर विरोधाभासी नहीं हैं, तर्क से जूझ रहे हैं। और जब पुराना मकान गिर जाता है, तो निमंत्रण दिया है नाचने का। तुम कहोगे यह विरोधाभासी है–पहले विचार और तर्क की बात करता था, अब नाचने और भाव की बात!

नहीं, तर्क से केवल पुराने को गिराया था, भाव से नये को बना रहे हैं; तर्क से जमीन साफ की थी, भाव के बीज बो रहे हैं। कुछ विरोध नहीं है।

‘लेकिन शंकर ने अपनी विश्व-विजय की घोषणा की।’

और यह घोषणा भी शंकर ने नहीं की; यह घोषणा उन्होंने की जो शंकर के पीछे थे, लेकिन शंकर को समझ नहीं पाए। पीछे होने से ही कोई समझ नहीं लेता। किसी के भी पीछे चलना बहुत आसान है, अनुयायी होना बहुत कठिन है। पीछे चलने में भी कोई बड़ी कला है? पीछे तो तुम किसी के भी चल सकते हो। अनुकरण में कोई कला नहीं है; अनुगमन आसान है। लेकिन वस्तुतः किसी को समझ लेना और उस समझ के अनुरूप अपने जीवन को विकसित करना बहुत कठिन है।

तो जो शंकर के पीछे चले, उन्होंने घोषणा की है शंकर की विश्व-विजय की; वे अब भी कर रहे हैं। शंकराचार्य पुरी के अब भी कर रहे हैं; करपात्री अब भी कर रहे हैं। वे अब भी कहे जाते हैं कि शंकर ने सारी दुनिया को हरा दिया; पुरी के शंकराचार्य अब भी कहे चले जाते हैं कि वे जगतगुरु हैं।

शंकर की वह घोषणा नहीं है। क्योंकि शंकर तो भलीभांति जानते हैं कि तर्क से न कभी कोई जीतता है और न कभी कोई हारता है। तर्क से केवल इतना ही सिद्ध होता है कि दूसरे का तर्क तुमसे कमजोर था, तुम थोड़े ज्यादा कुशल हो। लेकिन दूसरा कल ज्यादा कुशल होकर आ सकता है; तर्क की जीत कोई जीत नहीं है। शंकर भलीभांति जानते हैं कि तर्क की जीत कोई जीत नहीं है, जीत का धोखा है। और शंकर की चेष्टा भी नहीं है कि वे तर्क से किसी को जीत लें। उनकी चेष्टा तो बड़ी अनूठी है। लेकिन वह अनूठी चेष्टा, जो पीछे चल रहे हैं, उन्हें दिखाई नहीं पड़ेगी; उन्हें तो इतना ही दिखाई पड़ता है कि देखो एक आदमी को और हराया। वे जो पीछे चल रहे हैं, वे तो अहंकार की भाषा समझते हैं। वे यह नहीं देख रहे कि शंकर ने एक आदमी को हराया नहीं, एक आदमी को और जिताया; एक आदमी को हृदय के मार्ग पर लगाया; एक आदमी तर्क में डूबा-डूबा हार रहा था, उसे उबारा और उसे जीत का मार्ग दिया। अब जीतेगा यह आदमी।

इसलिए तो जिन्होंने–जैसे कुमारिल भट्ट ने–जो शंकर से हारे और शिष्य हो गए…कुमारिल भट्ट दुख और पीड़ा में शिष्य नहीं हुए। कुमारिल भट्ट अगर हार कर शिष्य होते तो भीतर दंश रह जाता। कुमारिल भट्ट को अगर पराजय प्रतीत होती तो वे पराजय का बदला लेने की कोई चेष्टा करते। नहीं, कुमारिल उतने ही तर्कनिष्ठ थे जैसे शंकर। शंकर से विवाद में कुमारिल को एक बात स्पष्ट दिखाई पड़ गई: तर्क व्यर्थ है। शंकर नहीं जीते, कुमारिल नहीं हारे–तर्क हारा, भाव जीता।

इसे थोड़ा समझने की कोशिश करनी जरूरी है।

शंकर से विवाद करते-करते, कुशल खिलाड़ी के साथ खेलते-खेलते कुमारिल को साफ दिख गया कि जिन चीजों पर मैंने बहुत भरोसा कर लिया था, वे हवा के झोंके में गिर जाती हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि उन्होंने शंकर का तर्क स्वीकार कर लिया। शंकर की कुशलता यही है कि विवाद में उन्होंने दिखा दिया कि तुम्हारे तर्क भी व्यर्थ हैं, मेरे तर्क भी व्यर्थ हैं; तर्क गिर गया; न कुमारिल हारे, न शंकर जीते–तर्क हारा। और चूंकि वह हार शंकर के माध्यम से आई तर्क की, कुमारिल झुके और शंकर के चरणों में गिर पड़े।

और ये बड़े माधुर्य से भरे हुए विवाद थे, बड़े प्रेम से भरे हुए विवाद थे; कहीं कोई लेशमात्र भी कटुता न थी। कोई दुश्मन की तरह नहीं लड़ रहे थे। जैसे दो व्यक्ति शतरंज खेलते हैं, वैसे तर्क की पूरी की पूरी सेना खड़ी की थी; दांव पर लगा दिया था जो भी बुद्धि में था। लेकिन शंकर हर एक चीज को काटते चले गए। उन्होंने काट-काट कर, जो अपना तर्क था, वह विरोधी के मन में नहीं रखा; वे केवल काटते चले गए। खाली जगह छूट गई। उस खाली जगह में शिष्यत्व उभरा। विरोधी ने देखा कि सामने जो खड़ा है, वह कोई सिद्धांत लेकर नहीं आया है, सत्य लेकर आया है। विरोधी ने देखा कि मेरे सब तर्क तोड़ दिए हैं, लेकिन कोई दूसरा तर्क उनकी जगह स्थापित करने को नहीं दिया है। रिक्त स्थान छूट गया–अंतराल है, खाली है, शून्य है। यह अवस्था ध्यान की बन गई। इस ध्यान के क्षण में वह झुका।

ध्यान रखना, वह कोई शंकर के प्रति झुक रहा है, यह भी तुम मत समझना; वह शंकर में जो सत्य प्रकट हुआ, उसके प्रति झुक रहा है। शंकर तो सिर्फ एक प्रतिमा हैं, एक प्रतीक हैं। वह जो सत्य सामने आया है, उसके प्रति झुक रहा है। और झुक रहा है, क्योंकि जगाया। झुक रहा है, इसलिए नहीं कि हराया; झुक रहा है, क्योंकि जगाया।

लेकिन जो पीछे खड़े हैं, उन्होंने देखा कि हार गया, झुक गया। उन पीछे चलने वालों ने घोषणा की कि शंकर की दिग्विजय हो गई; सारे संसार को हरा दिया। इन नासमझों के कारण शंकर की प्रतिमा भ्रष्ट हो गई; शंकर का वह जो आविर्भाव था, जो अनूठा भाव था, वह खो गया; एक साधारण परंपरा, एक सड़ा-संकीर्ण गलियारा बन गया; वह जो विराट पथ था खुले आकाश का, वह खुलापन न रहा।

इसलिए तुम पाओगे कि अगर शंकर को मानने वाला संन्यासी तर्कनिष्ठ है, तो वह कभी ‘भज गोविन्दम्’ इस तरह की बातों में नहीं पड़ेगा। ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि ये भज गोविन्दम् जैसे गीत शंकर के नाम पर दूसरों ने लिखे हैं, शंकर के नहीं हैं। क्योंकि शंकर और ऐसे गीत लिखेंगे! मीरा लिखे, समझ में आता है; चैतन्य कहें, समझ में आता है। शंकर? तर्क की ऐसी प्रखर धारा, वह ऐसे भक्ति के गीत गाए–संभव नहीं है। वे कहते हैं, ये सब दूसरों के द्वारा मिश्रित कर दिए गए हैं; शंकर की प्रतिष्ठा और नाम का लाभ उठाया है। वे इन गीतों को अलग काट देते हैं। वे तो केवल उन्हीं तर्कों पर भरोसा करते हैं, जिनका कोई भी मूल्य नहीं है।

शंकर ने तर्क दिए कि पुराना भवन गिरे, और फिर गीत बोए कि नया भवन उठे। उनकी प्रक्रिया को तुम विरोधाभासी मत मान लेना, अन्यथा तुम शंकर को समझ ही न पाओगे।

शंकर ने अपनी विश्व-विजय की घोषणा कभी नहीं की। जानने वाले महत्वाकांक्षी नहीं होते; जानने वाले अहंकारी नहीं होते।

ये विजय की घोषणाएं बड़ी बचकानी हैं। ये छोटे-छोटे बच्चों की बातें हैं। यहां कौन जीतने को है और कौन हारने को है? शंकर को दिखाई पड़ता है, एक ही परमात्मा है। अनेकता भ्रम है, एकता सत्य है। कौन जीतेगा, कौन हारेगा? हारेगा तो भी परमात्मा हारेगा, जीतेगा तो भी परमात्मा जीतेगा। जब वही जीत रहा है और वही हार रहा है, तो विश्व-विजय की घोषणा कौन करेगा?

नहीं, शंकर ऐसी भूल नहीं कर सकते। और की हो तो शंकर दो कौड़ी के हैं; फिर कोई मूल्य नहीं रह जाता। शंकर ने जगाया है, हराया नहीं।

‘और विवाद और शास्त्रार्थ में सैकड़ों मनीषियों को पराजित किया।’

नहीं, सैकड़ों मनीषियों को मनीषी बनाया। उसके पहले तक झूठी मनीषा से उलझे थे, खोटे सिक्के को सम्हाले बैठे थे, असली सिक्का दिखाया। स्वभावतः, असली सिक्का दिख जाए तो खोटा खोटा हो जाता है। और कोई उपाय भी नहीं है खोटे को खोटा करने का। अगर तुम हाथ में एक खोटा सिक्का लिए बैठे हो, तो क्या उपाय है समझाने का कि यह खोटा है? असली चाहिए। असली की तुलना में ही खोटा हो सकेगा। शंकर ने असली प्रकट किया। उसके प्रागटय में खोटा खोटा हो गया।

ये विवाद पश्चिम में चलते विवादों जैसे नहीं थे। ये विवाद, आज पूरब में भी जो विवाद चलते हैं, ऐसे विवाद न थे। ये विवाद बड़ी मधुरिमा से भरे थे। ये विवाद बड़े सत्यान्वेषणियों के विवाद थे।

विवाद दो तरह से हो सकता है। एक तो तुम जो कहते हो, वह सही है; क्योंकि तुम कहते हो। तुम और गलत हो सकते हो! जो कहते हो, उसका बहुत मूल्य नहीं है; तुमने कहा है, इसलिए सही होना ही चाहिए। तब विवाद व्यर्थ विवाद है। लेकिन तुम सत्य की जिज्ञासा करते हो। तुम यह नहीं कहते कि मैंने जो कहा है, वह सत्य होना चाहिए। तुम कहते हो, अब तक मैंने जैसा जाना है, उसमें मुझे यह सत्य मालूम पड़ता है; मैं तैयार हूं, अगर और जानने को आगे कुछ हो तो मैं खुला हूं; बंद नहीं हो गया हूं; निर्णय ले नहीं लिया है; लेकिन अब तक जो भी मैंने खोजा है, उसमें यह मुझे सत्यतर मालूम होता है। मैं तैयार हूं बदले जाने को; रूपांतरित होने को; जो मैं जानता हूं, उसे छोड़ने को; अगर सत्य मेरे सामने प्रकट हो तो उसे अंगीकार करने की मेरी पूरी तैयारी है। तब विवाद भी सत्योन्मुख हो जाता है। तब विवाद भी एक प्रक्रिया बन जाती है।

पूरब ने इस विवाद का उपयोग किया था। हजारों साल की परंपरा थी, तब ऐसा हो पाया था। हजारों साल तक मनीषी विचार किए, विवाद किए–सत्यान्वेषण के लिए। सत्य पा लिया है, ऐसा नहीं; सत्य की खोज कर रहे हैं, ऐसा। और जब किसी ने तुम्हारे असत्य को दिखा दिया, तो इतना साहस रखा कि उसके चरणों में झुकें। क्योंकि सत्य की खोज थी, तो जिसने भी दिखाया, वही गुरु। इसलिए शंकर से जो हारे, वे शिष्य हो गए।

शिष्यत्व का अर्थ ही इतना है कि हम जहां तक गए थे, वहां तुम एक कदम आगे ले गए; जहां तक हमारी आंखें देखती थीं, तुमने हमें और आगे का दर्शन कराया; जहां तक हम पहुंच सकते थे, तुमने अपने कंधों पर हमें उठा लिया और दूर तक का आकाश दिखाया।

सत्यान्वेषण बड़ी और बात है। और सत्यान्वेषण पर दृष्टि हो, तो विवाद का भी उपयोग हो सकता है। इसलिए मैं कहता हूं, जहर भी औषधि हो सकती है।

पश्चिम में भी विवाद चलते रहे हैं, लेकिन उन विवादों में पूरब का मजा नहीं है। वहां लड़ने वाले लड़ते ही रहे हैं, वे कभी किसी के शिष्य नहीं बने। वे विवाद करते रहे हैं, हारे हों कि जीते हों, प्रत्येक अपना राग अलापता रहा है। कोई तय ही नहीं कर पाया कि कौन जीता, कौन हारा।

यह भी थोड़े सोचने जैसी बात है।

शंकर मंडला पहुंचे। मंडन मिश्र का नगर था। मंडन के नाम पर ही मंडला का नाम है। गांव में प्रवेश पर उन्होंने कुएं पर पानी भरती स्त्रियों से पूछा कि मंडन मिश्र का घर कहां है?

वे हंसने लगीं। उन्होंने कहा, यह भी कोई पूछने की बात है? तुम पहचान ही लोगे। उस घर की हवा बता देगी। उस घर के सामने टंगे तोते भी उपनिषद के वचन बोलते हैं। उस घर के पास की हवा पुरातन है, प्राचीन है, पावन है। यह कोई पूछने की बात है? स्त्रियां हंसने लगीं। उन्होंने कहा, अजनबी, तुम जाओ, वह घर तुम्हें अपने आप बुला लेगा। उस घर को कोई पूछता है?

शंकर उस द्वार पर पहुंचे। बात सच थी। पक्षी द्वार पर बैठे गीत गा रहे थे, जिनमें उपनिषद और वेदों के वचन थे। शंकर भीतर गए और उन्होंने निमंत्रण दिया। मंडन ख्यातिलब्ध व्यक्ति थे। शंकर से उम्र में बड़े थे। शंकर से ज्यादा उनका यश था। शंकर से ज्यादा उनके शिष्य थे। शंकर ने निमंत्रण दिया कि मैं विवाद के लिए आया हूं; सत्यान्वेषण के लिए आपसे जूझना चाहता हूं।

स्वागत हुआ, घर में ठहराए गए। यह कोई दुश्मन तो न था। मंडन ने कहा, तुम युवा हो, इसलिए हम समतुल नहीं हैं। मेरा अनुभव बहुत है, तुम अभी जवान हो। शंकर की उम्र कोई तीस साल रही होगी; मंडन कोई पचास पार कर चुके थे। मैं तुम्हारे पिता की उम्र का हूं, इसलिए यह लड़ाई समतुल नहीं है। तो मैं तुम्हें एक सुविधा देता हूं, न्यायाधीश तुम चुन लो। कौन निर्णय करेगा–कौन जीता, कौन हारा। तुम अभी जवान हो, तो तुम चुन लो जो भी तुम ठीक समझो, वह निर्णय देगा।

यह बड़े प्रेम की लड़ाई थी, इसमें कोई झगड़ा न था। बूढ़े ने ज्यादा सुविधा दी जवान को, बेटे की तरह स्वागत किया। शंकर ने बहुत खोजा, लेकिन कोई जो मंडन की प्रतिष्ठा का हो, उसी को न्यायाधीश बनाया जा सकता है। मंडन की पत्नी के सिवा कोई समझ में न आया। तो कहा कि आपकी पत्नी–भारती उसका नाम था–वही निर्णय करे।

यह कोई झगड़ा था? इसको तुम झगड़े की भाषा में समझ सकते हो? क्योंकि पत्नी अगर निर्णय करेगी तो पति की तरफ झुक सकती है। यह डर बिलकुल स्वाभाविक होना चाहिए, अगर विवाद दुश्मनी का हो। लेकिन विवाद बड़े प्रेम का था, सत्यान्वेषण का था।

पत्नी निर्णायक बनी। और विवाद के बाद पत्नी ने निर्णय दिया कि मंडन हार गए, शंकर जीत गए। लेकिन पत्नी ने कहा, रुको! यह हार अभी अधूरी है, क्योंकि मैं अर्धांग हूं; तुमने अभी आधे मंडन को जीता, अब तुम्हें मुझसे विवाद करना पड़ेगा। यह बात बड़े मजाक की थी, लेकिन बड़ी मधुर थी। बात तो ठीक थी, शंकर भी इनकार न कर सके; क्योंकि पत्नी अर्धांग है, तो अभी आधे मंडन हारे हैं। अब यह झंझट हो गई। पत्नी ने निर्णय तो दे दिया कि मंडन हार गए। जिस पत्नी ने यह निर्णय दिया होगा, वह भी अनूठी रही होगी; क्योंकि पति को हराना इतना आसान! लेकिन उसने कहा कि एक बात रह गई अधूरी, तुम्हें मुझे भी हराना पड़ेगा।

शंकर ने स्वीकार किया विवाद को। और भारती ने जो सवाल पूछे, शंकर मुश्किल में पड़ गए। क्योंकि उसने कोई ब्रह्मज्ञान की बात न पूछी; वह तो समझ गई, इस विवाद को देख लिया था कि मंडन हार गए। यह युवा दिखाई युवा पड़ता है, यह सनातन, पुरातन मालूम होता है। यह तो सनातन पुरुष है; इससे ब्रह्म की बात करनी फिजूल है। उसमें तो मंडन को हारते उसने देख ही लिया था। और मंडन निश्चित ही भारती से ज्यादा जानते थे। भारती इसीलिए तो उनके प्रेम में पड़ी थी; उनकी पत्नी बनी थी; उनके चरणों की सेवा की थी। उनको हारते देख कर यह तो साफ ही हो गया था। उसने प्रश्न पूछे कामवासना के संबंध में।

शंकर युवा हैं; तीस साल उनकी उम्र है; अविवाहित हैं। मुश्किल में डाल दिया। शंकर ने कहा, छह महीने की सुविधा चाहिए। क्योंकि मैं तो अविवाहित हूं, ब्रह्मचारी हूं। प्रेम जाना नहीं, काम जाना नहीं। तो अभी जो भी उत्तर दूंगा, वे अनुभव से आए हुए न होंगे। और अनुभव से जो उत्तर न आए, वह भी कहीं सार्थक हो सकता है? शास्त्र मैंने पढ़े हैं। शंकर ने कहा कि जैसे मंडन ने शास्त्रों से पढ़ कर ब्रह्म के संबंध में बातें कीं और हारे, ऐसा ही अगर मैं कामवासना के संबंध में बातें करूंगा, वे शास्त्रों की होंगी और पक्का है कि मैं हारूंगा, तू जीत जाएगी। तू जानती है, हमने केवल सुना है; हमारा ज्ञान शास्त्रीय है, तेरा अनुभव का है। छह महीने का वक्त चाहिए, ताकि मैं भी अनुभव लेकर लौट आऊं।

ये विवाद बड़े प्रेमपूर्ण थे। भारती ने कहा, यह बिलकुल उचित है; तुम छह महीने की छुट्टी पर हो; तुम जाओ और अनुभव करके लौट आओ।

कहानी बड़ी अजीब है। शंकर बड़ी दुविधा में पड़ गए। ब्रह्मचर्य का व्रत लिया है, गुरु को वचन दिया है। अब जाकर विवाह करें या कोई स्त्री खोजें, तो सारा जीवन का ढांचा बदल जाए! तो कथा कहती है कि शंकर ने शरीर को छोड़ा और एक मृतक की देह में प्रविष्ट हुए–एक राजा मर रहा था, उसके प्राण निकले और शंकर प्रविष्ट हुए। छह महीने उसकी देह में रह कर उन्होंने शरीर और कामवासना का अर्थ समझा।

जब छह महीने बाद वे वापस लौटे, तो भारती ने उनकी तरफ देखा और कहा, विवाद की कोई जरूरत नहीं; तुम जान कर ही आए हो, बात खत्म हो गई। मुझे भी अपना शिष्य स्वीकार कर लो।

ये कोई दुश्मनी की बातें न थीं। ये बड़े प्रेम में, बड़ी गहन सहानुभूति में, एक-दूसरे के प्रति अपार श्रद्धा, अपार भाव से हुई घटनाएं थीं। मंडन और भारती शंकर के शिष्य हो गए।