क्या है आदि शंकर द्वारा लिखित ''सौंदर्य लहरी''की महिमा ?


ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

अर्थ :'' हे! परमेश्वर ,हम शिष्य और आचार्य दोनों की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों (गुरू और शिष्य) को साथ-साथ विद्या के फल का भोग कराए। हम दोनों एकसाथ मिलकर विद्या प्राप्ति का सामर्थ्य प्राप्त करें। हम दोनों का पढ़ा हुआ तेजस्वी हो। हम दोनों परस्पर द्वेष न करें''।

''सौंदर्य लहरी''की महिमा ;-

17 FACTS;-

1-सौंदर्य लहरी (संस्कृत: सौन्दरयलहरी) जिसका अर्थ है “सौंदर्य की लहरें” ऋषि आदि शंकर द्वारा लिखित संस्कृत में एक प्रसिद्ध साहित्यिक कृति है। कुछ लोगों का मानना है कि पहला भाग “आनंद लहरी” मेरु पर्वत पर स्वयं गणेश (या पुष्पदंत द्वारा) द्वारा उकेरा गया था। शंकर के शिक्षक गोविंद भगवदपाद के शिक्षक ऋषि गौड़पाद ने पुष्पदंत के लेखन को याद किया जिसे आदि शंकराचार्य तक ले जाया गया था। इसके एक सौ तीन श्लोक (छंद) शिव की पत्नी देवी पार्वती / दक्षिणायनी की सुंदरता, कृपा और उदारता की प्रशंसा करते हैं।सौन्दर्यलहरी/शाब्दिक अर्थ सौन्दर्य का सागर आदि शंकराचार्य तथा पुष्पदन्त द्वारा संस्कृत में रचित महान साहित्यिक कृति है।इसमें माँ पार्वती के सौन्दर्य, कृपा का १०३ श्लोकों में वर्णन है।भगवत्पाद शंकराचार्य की सौन्दर्यलहरी प्रथम तान्त्रिक रचना है जिसमें सौ श्लोकों के माध्यम से आचार्य शंकर ने भगवती पराशक्ति पराम्बा त्रिपुरसुन्दरी की कादि एवं हादि साधानाओं के गोप्य रहस्यों का उद्यघाटन किया है और पराशक्ति भगवती के अध्यात्मोन्मुख अप्रतिम सौन्दर्य का वर्णन किया है।ये त्रिपुर-सुंदरी रूप की उपासना का ग्रन्थ है इसलिए भी सौन्दर्यलहरी है।

2-भगवत्पाद ने सौन्दर्यलहरी की रचना कर भगवती के स्तवन से श्रीविद्या की उपासना एवं महिमा, विधि, मन्त्र, श्रीचक्र एवं षट्चक्रों से उनका सम्बन्ध तथा उन षट्चक्रों के वेधरूपी ज्ञान के प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया है।सौन्दर्यलहरी में कुल सौ श्लोक हैं, जिनमें से आदि के इकतालिस श्लोक आनन्दलहरी के नाम से प्रसिद्ध हैं। शेष उनसठ श्लोकों में देवी के सौन्दर्य का नखशिख वर्णन है। वस्तुत: 'आनन्द' ब्रह्मा का स्वरूप है जिसका ज्ञान हमें भगवती करा देती है। अत: ब्रह्मा के स्वरूप 'आनन्द' को बताने वाली भगवती उमा के स्वरूप का प्रतिपादन शेष उनसठ श्लोकों में वर्णित है।तंत्र में कई यंत्र भी प्रयोग में आते हैं। ऐसे यंत्रों में सबसे आसानी से शायद श्री यंत्र को पहचाना जा सकता है।

3-सौन्दर्यलहरी के 32-33वें श्लोक इसी श्री यंत्र से जुड़े हैं। साधकों के लिए इस ग्रन्थ का हर श्लोक किसी न किसी यंत्र से जुड़ा है, जिसमें से कुछ आम लोगों के लिए भी परिचित हैं, कुछ विशेष हैं, सबको मालूम नहीं होते। शिव और शक्ति के बीच कोई भेद न होने के कारण ये अद्वैत का ग्रन्थ भी होता है। ये त्रिपुर-सुंदरी रूप की उपासना का ग्रन्थ है इसलिए भी सौन्दर्य लहरी है। कई श्लोकों में माता सृष्टि और विनाश का आदेश देने की क्षमता के रूप में विद्यमान हैं।सौन्दर्यलहरी केवल काव्य ही नहीं है, यह तंत्रग्रन्थ है। जिसमें पूजा, यन्त्र तथा भक्ति की तांत्रिक विधि का वर्णन है। इसके दो भाग हैं-

आनन्दलहरी - श्लोक १ से ४१

सौन्दर्यलहरी - श्लोक ४२ से १०३

4-एक बार ऐसा कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य शिव और पार्वती की पूजा करने के लिए कैलाश गए थे। वहां, भगवान ने उन्हें १०० श्लोकों वाली एक पांडुलिपि दी, जिसमें देवी के कई पहलुओं को उन्हें उपहार के रूप में वर्णित किया गया था। जब शंकर कैलाश के दर्शन कर लौट रहे थे, तब नंदी ने उन्हें रास्ते में रोक दिया। उसने उससे पांडुलिपि छीन ली, उसे दो भागों में फाड़ दिया, एक भाग लिया और दूसरा शंकर को दे दिया। शंकर, शिव के पास दौड़े और उन्हें घटना सुनाई। शिव ने मुस्कुराते हुए, उन्हें १०० छंदों के प्रारंभिक भाग के रूप में ४१ छंदों को अपने साथ रखने की आज्ञा दी और फिर, देवी की स्तुति में अतिरिक्त ५९ छंद लिखने की आज्ञा दी। इस प्रकार, श्लोक १-४१ भगवान शिव की मूल कृति है, जो तंत्र, यंत्र और विभिन्न शक्तिशाली मंत्रों के प्राचीन अनुष्ठानों पर बहुत प्रकाश डालते हैं।आदि शंकराचार्य ने सौंदर्य लहरी में कहा-चतुर्भि: श्रीकंठे: शिवयुवतिभि: पश्चभिरपि ../नवचक्रों से बने इस यंत्र में चार शिव चक्र, पांच शक्ति चक्र होते हैं।

5-श्लोक १-४१ शिव और शक्ति के मिलन और संबंधित घटनाओं के रहस्यमय अनुभव का वर्णन करता है। शेष श्लोक अर्थात 42-100 की रचना स्वयं आदि शंकर ने की है, जो मुख्य रूप से देवी के स्वरूप पर केंद्रित हैं।सभी १०० श्लोकों को सामूहिक रूप से 'सौंदर्य लहरी' के रूप में जाना जाता है। सौंदर्य लहरी केवल एक कविता नहीं है। यह एक तंत्र पाठ्यपुस्तक है, जिसमें पूजा और प्रसाद, कई यंत्र, प्रत्येक श्लोक के लिए लगभग एक निर्देश दिया गया है; प्रत्येक विशिष्ट श्लोक से जुड़ी भक्ति करने की तंत्र तकनीक का वर्णन करना; और उससे होने वाले परिणामों का विवरण देता है।श्लोक 42-100 अधिक सीधे हैं; वे देवी की शारीरिक सुंदरता का वर्णन करते हैं और कभी-कभी उन्हें सौंदर्य लहरी भी कहा जाता है। 6-कुंडलिनी की अवधारणा;- पहले ४१ श्लोकों में माता की आंतरिक पूजा का विस्तृत विवरण दिया गया है। इसमें कुंडलिनी , श्री चक्र , मंत्र (श्लोक ३२, ३३) की अवधारणा की व्यवस्थित व्याख्या शामिल है। यह सर्वोच्च वास्तविकता को अद्वैत के रूप में दर्शाता है लेकिन शिव और शक्ति, शक्ति धारक और शक्ति, होने और इच्छा के बीच अंतर के साथ। शक्ति, अर्थात् , माता या महा त्रिपुर सुंदरी , प्रमुख कारक बन जाती है और शक्ति धारक या शिव एक आधार बन जाते हैं। प्रथम श्लोक में ही इस विचार का स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है। "शक्ति के साथ संयुक्त, शिव बनाने की शक्ति के साथ संपन्न है, या अन्यथा, वह एक आंदोलन भी करने में असमर्थ है।"इसी विचार को श्लोक 24 में लाया गया है, "ब्रह्मा ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं, विष्णु पालन करते हैं, रुद्र नष्ट करते हैं, और महेश्वर हर चीज को अवशोषित करते हैं और सदाशिव में आत्मसात करते हैं। आपकी लता जैसे भौंहों से जनादेश प्राप्त करने पर, सदाशिव सब कुछ पिछले की तरह गतिविधि में पुनर्स्थापित करता है चक्र।" माता की ऐसी प्रधानता श्लोक ३४ और ३५ में भी देखी जा सकती है।

7-सौन्दर्य लहरी आदि शंकर की अप्रतिम सर्जना का अन्यतम उदाहरण है। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ।पुरानी मान्‍यता है कि जब एक ही जगह पर, एक ही स्‍वर में, एकजुट होकर मंत्र का जाप किया जाए तो उस जगह ऊर्जा का ऐसा चक्र निर्मित होता है, जो मनमंदिर, शरीर, आत्‍मा सभी को अपनी परिधि में ले लेता है। नाद-ब्रह्म की कल्‍पना हमारे यहां उसी संदर्भ में स्‍वीकृत की गई है। आधुनिक विज्ञान भी नाद-ब्रह्म के सामर्थ्‍य का, मंत्रों के उच्‍चारण की ताकत का इन्‍कार नहीं करता है।सौन्‍दर्य लहरी के अदभुत पाठ से पूरे वातावरण में ऊर्जा महसूस होता है।एक दिव्‍य अनुभूति ...जिसमें रस भी है, रहस्‍य भी है और ईश्‍वर के साथ रम जाने की अदम्‍य इच्‍छा भी है।सौन्‍दर्य लहरी के हर मंत्र में एक अलग शक्ति है, एक अलग भाव है।उत्तर भारत में जैसे दुर्गा-सप्तशती का पाठ होता है वैसे ही दक्षिण में सौन्दर्यलहरी का पाठ होता है।शिव और शक्ति के अभेद तथा परस्पर अपेक्षिता तथा शक्ति के कल्याणकारी स्वरूप का दर्शन सौन्दर्यलहरी में जिस प्रकार से प्राप्त होता हैं; वैसे अन्यत्र कहीं नहीं हैं।

8-भगवान् शंकराचार्य ने अपनी शक्ति-साधना के अनुभवों की हलकी-सी झाँकी सौंदर्य लहरी में प्रस्तुत की है। शक्ति के बिना शिव की प्राप्ति नहीं हो सकती। उपनिषद्कार के अनुसार यह आत्मा बलहीनों को प्राप्त नहीं होती। दुर्बलता के रहते ब्रह्म तक पहुँच सकने की क्षमता कहाँ से आ सकती है। इस दृष्टि से ब्रह्मविद्या के सहारे ब्रह्मवेत्ता बनने और ब्रह्मतत्व को प्राप्त करने के प्रयत्न में भगवान् शंकराचार्य को शक्ति-साधना करनी पड़ी। और इसके लिए योगाभ्यास के—प्रत्याहार,धारणा, ध्यान, समाधि के प्रयोग ही पर्याप्त नहीं रहे, वरन् उन्हें पंच-तत्वों की प्रवृत्ति का संचार और नियंत्रित कर्तीृ अपराविद्या का अवलम्बन लेकर शरीर और मन को भी समर्थ बनाना पड़ा। इस प्रयोजन के अपराविद्या की साधना में कुंडलिनी शक्ति को प्रमुख माना जाता रहा है। इसे कामकला या काम-बीज भी कहते हैं। प्रजनन प्रयोजन में भी यह कला प्रयुक्त होती है और उसका जननेन्द्रिय के गुह्य क्रियाकलापों से भी संबंध है, इसलिये उसे गोपनीय गिन लिया जाता है और उसकी चर्चा अश्लील मानी जाती है, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं।

9-अश्लील कोई अवयव या कोई क्रियाकलाप नहीं। प्रजनन को अपने यहाँ एक धर्म कृत्य माना गया है। सोलह संस्कारों में गर्भाधान भी एक संस्कार है। जिसकी पृष्ठभूमि धर्मकृत्यों के देवता और गुरुजनों के आशीर्वाद के साथ विनिर्मित की जाती है। भगवान् शिव का प्रतीक विग्रह जननेन्द्रिय के रूप में ही है, जिसे धर्मभावना और श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। निन्दनीय वह प्रक्रिया ही हो सकती है, जिसके द्वारा पशुप्रवृत्ति को भड़काने में सहायता मिले। शंकराचार्य ने भारती के प्रश्नों को यह कहकर टाला नहीं कि हम संन्यासी हैं, हमें 'कामविद्या' के संदर्भ में कुछ जानना या बताना क्या आवश्यक है? वे जानते थे कि योग परा और अपराविद्या के सम्मिश्रण का नाम है। परा अर्थात् ब्रह्मविद्या ज्ञान-विद्या अपरा अर्थात् शक्तिविद्या आत्मवेत्ता को दोनों ही जाननी चाहिए।

10-जो शक्ति है, उसके सदुपयोग-दुरुपयोग की जानकारी होना भी आवश्यक है। शरीर के क्रिया-कलाप और मन के उल्लास, जिस सूक्ष्म शक्ति से प्रेरित, प्रोत्साहित और कर्म प्रवृत्त होते हैं, उस कुण्डलिनी शक्ति को उपेक्षा में नहीं डाला जा सकता। इस उपेक्षा से विकृतियाँ उत्पन्न होने और सदुपयोग की अनभिज्ञता से अहित ही हो सकता है। इसलिए गृहस्थ, ब्रह्मचारी सभी के लिए उसे जानना आवश्यक है।मस्तिष्क के मध्य ब्रह्मरंध्र में 'ज्ञानबीज' और जननेन्द्रिय मूल में 'कामबीज' स्थित हैं। कामबीज को नारी की 'योनि' की संज्ञा दी जाती है और ज्ञानबीज को 'शिश्न' की। यह मात्र आकर्षक कल्पना ही नहीं; इसमें वैज्ञानिक तथ्य भी हैं। उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव की तरह यह दो अत्यंत सामर्थ्यवान् प्रचण्ड क्षमताओं से परिपूर्ण दो शक्ति-संस्थान विद्यमान हैं। मस्तिष्क का सदुपयोग जानने और करने वाले व्यक्ति जिस प्रकार भौतिक और आत्मिक प्रगति कर सकते हैं, उसी प्रकार कामशक्ति कुंडलिनी का सदुपयोग करके भी जीवन के हर क्षेत्र में उत्साह और उल्लास विकसित किया जा सकता है। न केवल शरीर और मन के विकास के लिए, न केवल भौतिक सफलताएँ, समर्थताएँ प्राप्त करने के लिए, वरन् आत्मिक और भावनात्मक प्रगति के लिए इस शक्ति की प्रक्रिया का ज्ञान एवं अनुभव होना आवश्यक है।

11-अध्यात्म शास्त्रों में कुण्डलिनी के संबंध में बहुत कुछ बताया गया है।योग राजोपनिषद केअनुसारअपान स्थल मूलाधार में कंद है। उसे कामरूप-कामबीज कहते हैं। उसे ही वह्नि कुण्ड अथवा कुण्डलिनी तत्त्व कहते हैं। वायु पुराण केअनुसार जीव ने ब्रह्म से कहा। आप बीज हैं, मैं योनि हूँ। यह क्रम सनातन है । कुंडलिनी स्थान पर अधोलिंग का, शिखा स्थान पर पश्चिम लिंग का और भृकुटियों के मध्य ज्योतिर्लिंग का ध्यान करना चाहिए। प्रकृति का प्रतिनिधित्व करने वाला केन्द्र है— जननेन्द्रिय मूल—कुण्डलिनी चक्र। और पुरुष का मनुष्य शरीर से मस्तिष्क के मध्य ब्रह्मरन्ध्र—सहस्रार चक्र में अवस्थित है। जब तक दोनों का मिलन नहीं होता, बिजली की दो धा राएँ-पृथक-पृथक रहने की तरह मानव जीवन में भी सब कुछ सूना रहता है। पर जब इन दोनों शक्ति केन्द्रों का परस्पर संबंध-समन्वय-सहचर्य आरंभ हो जाता है तो ग्रीष्म और शीत के मिलने पर आने वाले बसन्त की तरह जीवन उद्यान भी पुष्प-पल्लवों से भर जाता है। इसी प्रयत्न के किए जाने वाले प्रयोग को कुण्डलिनी जागरण कहते हैं।

12-शंकराचार्य के ज्ञान और अनुभव में यही कमी देखकर भारती ने उनकी साधना-अपूर्णता को चुनौती दी थी और शास्त्रार्थ के लिए ललकारा था। काम केन्द्र में स्फुरणा बड़ी सरस और कोमल है। समस्त कलाएँ और प्रतिभाएँ वहीं पर केन्द्रीभूत हैं। जो लोग उस सामर्थ्य को मैथुन प्रयोजन के तुच्छ क्रीड़ा -कल्लोल में खर्च करते रहते हैं, वे उन दिव्य विभूतियों से वंचित रह जाते हैं जो इस कामशक्ति को सृजनात्मक दिशा में मोड़कर उपलब्ध की जा सकती हैं। आत्मविद्या के ज्ञाता इस कामशक्ति को न तो हेय मानते हैं और न तिरस्कृत करते हैं, वरन् उसके स्वरूप, उपयोग को समझने और सृजनात्मक प्रयोजन के लिए प्रयुक्त करने के लिए सचेष्ट होते हैं।ब्रह्म को शिव और प्रकृति को शक्ति कहते हैं। इन दोनों के मिलन का अतीव सुखद परिणाम होता है। ब्रह्मरन्ध्र में अवस्थित और ज्ञानबीज और जननेन्द्रिय मूल में सन्निहित कामबीज का मिलन भी जब संभव हो जाता है, तो बाह्य और आन्तरिक जीवन में आनन्द, उल्लास का ठिकाना नहीं रहता है।

13-ब्रह्मानन्द की तुलना मोटे अर्थ में विषयानन्द से की जाती रही है। यह अन्ततः शक्तियों का मिलन भी अलंकारिक भाषा में ब्रह्ममैथुन कहा जाता है। कुण्डलिनी-साधना की जब प्राप्ति होती है तो इस स्तर का आनन्द भी साधक को सहज ही मिलने लगता है।योगिनी तंत्र के अनुसार ''हे पार्वती, सहस्रकमल में जो कुल और कुण्डलिनी—महासर्प और महासर्पिणी का मिलन है। उसी को यतियों ने परम मैथुन कहा है। तंत्र सार के अनुसार आत्मा को परब्रह्म के साथ प्रगाढ़ आलिंगन में आबद्ध करके परम रस में निमग्न रहना ..यही यतियों का मैथुन है ; कामसेवन नहीं। इड़ा, सुषुम्ना और जीवात्मा संगम इसे मैथुन सुख कहते हैं। शंकराचार्यकृत सौंदर्यलहरी में कुण्डलिनीशक्ति को रूपवती युवती के रूप में चित्रित किया गया है और उसके ब्रह्ममिलन को काम-कल्लोल, मैथुन की भाषा में चित्रित किया गया है।सन्त कबीर की 'उलटा बासियों” में इसी प्रकार का प्रयोग है। उन्होंने जीवात्मा को प्रेमिका और परमात्मा को प्रेमी के रूप में चित्रित किया है।

14-त्रिपुरोपनिषद के अनुसार उसका अंकुश मधु की तरह अत्यंत मधुर है। क्रूर भी उस पाश में बँध जाते हैं। पाँच बाणों वाले काम-धनुष में वह अरुणा सबको अपनी मुट्ठी में रखती है।''कुण्डलिनी विद्या को इसीलिये भुक्ति और मुक्ति उभयसंपदाएँ प्रदान करने वाली कहा गया है। वह दीप्तिमान देवी सौम्या, भोगिनी, भोगशायिनी, त्रैलोक्य सुंदरी, रम्य, सौम्यरूपा और कामचारिणी है।सौंदर्य लहरी'' के कतिपय श्लोकों में कुण्डलिनी के कामबीज की महत्ता और उसकी उपलब्धियों की ओर संकेत किया है।नीचे उनमें से कई श्लोक इसलिए दिए जा रहे हैं कि आत्मसाधना के पथ पर चलने वाले पथिक यह समझ सकें कि अपने अन्तरंग में भरी हुई क्षमता का श्रेष्ठतम लाभ कैसे उठाया जा सकता है। कामबीज का भोंड़ा लाभ तो पशु-पक्षी, कीट-पतंग सभी उठाते हैं। पर यदि उसका विशिष्ठ उपयोग संभव हो सके, तो उससे असंख्य गुनी आनन्द, उल्लास भरी उपलब्धियाँ प्रा प्त की जा सकती हैं। कुण्डलिनी जागरण से जहाँ ब्रह्मानंद की हिलोरें अन्तःकरण को विभोर करती हैं वहाँ उनमें यह क्षमता भी है कि शारीरिक आनंद को न केवल उत्साहवर्धक बना सकें, वरन् उपयोगी भी बना सकें। ऐसे हास-विलास शरीरों की जितनी क्षति करते हैं, उससे अनेक गुनी उपलब्धियाँ भी लाकर रख देते हैं। इस प्रकार उस शक्ति का भौतिक उपयोग भी उतना ही आनंदमय, उत्साहवर्धक और लाभदायक बन जाता है, जिससे गृहस्थ और ब्रह्मचर्य का समन्वित लाभ प्राप्त किया जा सके।

15-सौंदर्य लहरी मंत्रोचारण अनुष्ठान में भाग लेने से आपको निम्नलिखित लाभ प्राप्त हो सकते हैं:-

1-समस्त मनोकामनाओं व इच्छाओं की पूर्ति होती है|

2-आपको उत्तम स्वास्थ्य, धन, ज्ञान व समृद्धि की प्राप्ति होती है|

3-संतान सुख व दीर्घायु प्राप्त होती है|

4-संपूर्ण शक्ति, बल व विजय की प्राप्ति होती है|

5-किसी को भी आकर्षित करने व शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति मिलती है|

6-रोगों से मुक्ति व सुरक्षा प्राप्त होती है|

7-बुरे जादू व भय का नाश होता है|

8-परम शक्ति व आनंद प्राप्त होता है|

सौंदर्य लहरी के विशेष श्लोक ;-

सौंदर्य लहरी में इसी तथ्य का प्रतिपादन करने वाली कुछ भगवान् शंकराचार्य की अनुभूतियाँ है, जो समझने योग्य हैं —उनमें से कुछ नीचे देखिये।

1-श्लोक भावार्थ- ''जो स्तन मुख की तरह गोल तथा एक मुख वाला है। उसके नीचे तीन गुहा सदृश घर बने हुए हैं। ऐसी कामकला का कोई कामी मनुष्य उपभोग करता है तो उसकी कामनापूर्ण होती है और वह स्वयं कामरूप हो जाता है।

2-श्लोक भावार्थ - ''बल खाती हुई कटी, भ्रमरी जैसी चंचलता; अलकावलि से आच्छादित मुख, कमल पुष्पों जैसा परिहास; स्फटिक जैसे दाँतों से युक्त हे देवि, तेरी मुस्कराहट के समय निकलने वाली सुगंध से कामदहन करने वाले शिवजी भी भ्रमर की तरह उन्मत्त हो जाते हैं।'' संकेत—मन को सिकोड़कर बैठे हुए, निष्क्रिय, निराश और नीरस लोग भी कुण्डलिनी की स्फुरणा प्राप्त करके इठलाते हुए, भ्रमरी जैसे सक्रिय अलका वलि जैसे स्निग्ध, शोभित, बढ़ चलने वाले, हँसमुख स्वभाव और अपनी वाणी से सर्वत्र सुगंध फैलाने वाले बन जाते हैं और निष्क्रिय लोगों को भी आशा और स्फूर्ति की उमंग से उन्मत्त कर देते हैं।

3-श्लोक भावार्थ-''तेरे विशाल नेत्र कानों तक जा पहुँचे हैं और दो पलकों को पंखों की तरह धारण किये हुए हैं। यह कान तक तने हुए कामदेव के पुष्पबाण शिवजी के चित्त को भी अशांत कर देते हैं। संकेत—कुण्डलिनी-साधक का दृष्टिकोण विशाल, परिष्कृत और दूरदर्शी हो जाता है।

4-श्लोक भावार्थ-''विशाल नेत्र अर्थात् विशाल हृदय एवं विशाल दृष्टिकोण का विस्तार।उन पर मर्यादा और लोकहित के दो बंधन अर्थात् पलक पंख। 'इस आंतरिक सुसंपन्नता से समर्थ बना हुआ साधक अपने प्रतिपादन पर भगवान का भी सिंहासन हिला सकता है। और ईश्वर की भी निष्क्रियता को उसी तरह क्रियाशील बना देता है जैसा कि कामदेव ने शिवजी के चित्त को भी अशांत कर दिया था।पूर्वकाल में विष्णु ने तुम्हारी आराधना करके मोहिनी रूप पाया और शिवजी के मन में भी काम विकार उत्पन्न कर दिया। कामदेव भी तुम्हारी ही आराधना से अपनी पत्नी का नयनाभिराम बना हुआ है और बड़े-बड़े मुनियों के मन में भी क्षोभ उत्पन्न करता रहता है।

संकेत -मोहिनी वह जो दूसरों को मोहित कर ले, पर स्वयं मोहित न हो। योग साधना से मनुष्य में वे सद्गुण विकसित होते हैं, जिनके कारण दूसरे सभी लोग उससे प्रभावित एवं आकर्षित होते हैं। परिष्कृत दृष्टिकोण हो जाने पर मनुष्य स्वभावतः सम्मान और श्रद्धा का केन्द्र बन जाता है, यही व्यक्ति का मोहिनी रूप है। इस सफलता को पाने के साथ-साथ आत्मवेत्ता स्वयं किसी पर मोहित नहीं होता। न व्यक्ति न पदार्थ दोनों में उसे आकर्षण नहीं होता। वह तो अपनी आत्मा पर ही मोहित रहता है, इसलिए उसका प्यार कर्त्तव्य एवं आदर्श की परिधि में सीमाबद्ध हो जाता है। ऐसी मोहिनीवृति कुण्डलिनी साधना के प्रभाव से उपलब्ध होती है। कुण्डलिनी जागरण के साथ−साथ कामवृति का भी परिष्कार होता है। बहिर्मुखी लोगों के मन में उससे काम-क्षोभ भी उत्पन्न हो सकता है और बढ़ सकता है। पर विज्ञसाधक उसे रचनात्मक प्रयोजन में मोड़कर जीवन को अधिक सरस एवं उल्लसित बना लेते हैं।

5-श्लोक भावार्थ- ''कामदेव पुष्पों का धनुष, भ्रमरी की रस्सी, पाँच विषयों के बाण, वसंत रूपी सेनापति, मलयगंधरूप रथ में बैठकर -शरीर न रहते हुए भी सारे जगत को अकेला जीत लेता है। उस कामदेव को यह सामर्थ्य तुम्हारी कृपा से ही प्राप्त होती है''।

संकेत ;-कुण्डलिनी का केंद्र जननेंद्रिनेंय मूल में रहने से कामप्रवृत्ति का प्रदीप्त होना स्वाभाविक है। यह प्रवृत्ति इच्छा और क्रिया दोनों का सृजन करती है। मस्तक में उपस्थित ज्ञानकेन्द्र के निर्णयों को आकांक्षा एवं क्रिया के रूप में बदल देना इसी शक्ति का कार्य है। कामप्रवृत्ति मनुष्य का मन, शरीर और स्वभाव सभी प्रफुल्लित, आशान्वित एवं स्फूर्तिवान रहते हैं। इसका सदुपयोग होने से व्यक्ति आध्यात्मिक दृष्टि से कामदेव सरीखा आकर्षक हो जाता है। पुष्पों की तरह हँसता, मुस्कुराता मुख, भ्रमर जैसी दिव्य रसिकता, पाँचों ज्ञानेन्द्रिय का निग्रह, मलयगंध जैसी प्रवृत्ति से सम्पन्न होने वाला व्यक्ति अकेला ही संसार को प्रभावित कर सकता है। कामप्रवृत्ति के सदुपयोग का यही स्वाभाविक परिणाम है। कुण्डलिनीशक्ति की कृपा से यह उपलब्धियाँ सहज ही संभव हो जाती हैं।

6-श्लोक भावार्थ-''वृद्ध, कुरूप, क्रीड़ा से अनभिज्ञ जड़ मनुष्य भी तुम्हारी दृष्टि पड़ने पर इतना कमनीय और रमणीय हो जाता है कि अनेक युवतियाँ उसके पीछे असंयमी होकर अस्त-व्यस्त की तरह भागने लगती हैं'' ।

संकेत ;-मानसिक दृष्टि से निराश को वृद्ध, दुर्गुणी को कुरूप और नीरस, कर्कश स्वभाव वाले को मूढ़ कहते हैं। ऐसा व्यक्ति भी कुण्डलिनी साधना से सहृदय, सज्जन, सद्गु णी और सरस बनकर एक प्रकार से अपना आंतरिक कायाकल्प ही कर डालता है। 7-श्लोक भावार्थ - ''ऋद्धि और सिद्धियाँ उसके पीछे ऐसे ही भागती हैं, जैसे कुलटा नारियाँ किसी रूप, सौंदर्य सम्पन्न आकर्षक स्वभाव वाले कामुक युवक के पीछे बिना बुलाए ही फिरने लगती हैं''।

संकेत ;-महाशक्ति की साधना से उत्पन्न आकर्षण प्राण- प्रवाह (काम) के प्रभाव से अनेक सत्प्रवृत्तियाँ और सफलताएँ आकर्षित होने लगती हैं। जैसे खिले हुए फूल पर तितलियाँ और मधुमक्खियाँ मंडराती हैं वैसे ही उस साधक को विभूतियों का दुलार और सहयोग अनायास ही सब ओर से प्राप्त होता है। यह प्रकृति भी अनुकूल हो जाती है और परिस्थितियाँ उसके इशारे पर नाचती, बदलती, सँभलती रहती हैं।

8-श्लोक भावार्थ तेरी काम कला के प्रभाव से मनुष्य के लिए स्त्रियों के मन में तु्रंत क्षोभ उत्पन्न कर देना बाँये हाथ का खेल होता है। सच तो यह है कि तेरी साधना करने वाला इन सूर्य-चन्द्ररूपी दो स्तनों वाली प्रकृति-तरुणी को भी अपने इशारे पर नचा सकता है।

9-श्लोक भावार्थ तुम्हारी ही दी हुई वाक् शक्ति से तुम्हारी ही स्तुति करना, सूर्य को दीपक दिखाना, ओस से चन्द्रमा को अर्घ चढ़ाने अथवा समुद्र के ही जल-कणों से महासागर करने जैसा ही बाल-प्रयास है।

संकेत ;-मनुष्य के पास जो कुछ है सो सारा वैभव इस कुण्डलिनी नाम से संबोधित पराशक्ति का ही है। तुम्हारी दी हुई वाणी, काया, चेतना तथा सामग्री से ही तुम्हारा स्तवन वंदन कैसे हो ? इसका विकल्प यही है कि साधक अपना आत्मसमर्पण इस सत्ता के चरणों में करके उसी के दिव्य संकेतों के अनुरूप दिव्य जीवन जीने के लिए कदम बढ़ाए और सच्ची साधना करने वाले सच्चे साधक को लोक-परलोक में आनन्द-उल्लास भरा रखने वाली परम गति को प्राप्त करे।

10-श्लोक भावार्थ -''तेरे स्तनों से बहने वाले ज्ञानामृतरुपी पयपान करके यह द्रविण शिशु (शंकराचार्य) प्रौढ़ कवियों जैसी कमनीय कविताएँ रच सकने में समर्थ हो गया''।

संकेत; -

श्री आद्य शंकराचार्य अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं कि मैं तुच्छ-सा द्रविड़वंश का बालक कुण्डलिनी माता का ज्ञानामृतरूपी पयपान करने के कारण इतना समर्थ हो गया कि बचपन में ही प्रौढ़कवियों जैसा साहित्यसृजन करने लगा। ऐसा ही मेधा- प्रगति का लाभ दूसरे श्रद्धावान साधक भी उठा सकते हैं। एक गाथा यह प्रचलित है कि एक बार शंकराचार्य के पिताजी कहीं प्रवास में गए और अपनी अनुपस्थिति में अपनी पत्नी को भगवती के विग्रह की पूजा करते रहने का निर्देश कर गए। इसी बीच एक दिन शंकराचार्य की माताजी पूजा न कर सकीं, कीं तो उन्होंने बालक को दूध लेकर भगवती का भोग लगाने भेजा। भोग लगाया पर दूध ज्यों का त्यों रखा रहा। तब बालक ने रोकर पीने की प्रार्थना की। भगवती ने उसे पी लिया। अब बालक को और व्यथा हुई। भोग से बचा दूध उन्हें मिलता था, वह तो भगवती पी गई, उसे खाली हाथ रहना पड़ा। दूध न मिलने के कारण रोते हुए शंकराचार्य को भगवती ने छाती से लगा लिया और उसे स्तन पान कराया। इसे पीते ही वे प्रचंड विद्वान और प्रखर कवि हो गए और अद्भुत रचनाएँ करने लगे। इसी घटना का संकेत सौंदर्य लहरी के श्लोक 75 में मिलता है।श्री शंकराचार्य की भावविभोरता देखते ही बनती है। महाशक्ति के अनुग्रह से वे जिस प्रकार कृतकृत्य हुए और उन्होंनेन्हों उसकी महान संभावनाओं तथा अनुकंपाओं का स्वरूप समझा, उसे देखते हुए यह भावविभोरता उचित भी है।

श्री आद्य शंकराचार्य के कुण्डलिनी अनुभव -

11-श्लोक भावार्थ—मैं अपनी छहों इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ छठा मन) इन छहों पैरों से—षट् पद भ्रमर की तरह तुम्हारे पतितों को उबारने वाले चरणकमलों का मकरंदपान करता रहूँ।

संकेत; -

श्री आद्य शंकराचार्य कुण्डलिनी शक्ति की महान उपलब्धियों का रसास्वादन करते हुए आनन्दविभोर होकर एकमात्र यही का मना करते हैं कि उस महासत्ता पद पद्मों का षट् पद—'भौंरे ' की तरह मकरन्दपान करते रहें। षट्चक्रों की आराधना में निरन्तर संलग्नता का भाव भी 'षट्पद' शब्द में है। इस मार्ग पर चलने वाले हर साधक को उपलब्ध आनन्द की अनुभूति करते हुए ऐसी ही आकांक्षा उमड़ती है।

12-श्लोक भावार्थ—मैं अपनी छहों इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ छठा मन) इन छहों पैरों से—षट् पद भ्रमर की तरह तुम्हारे पतितों को उबारने वाले चरणकमलों का मकरंदपान करता रहूँ।

संकेत; -

श्री आद्य शंकराचार्य कुण्डलिनी शक्ति की महान उपलब्धियों का रसास्वादन करते हुए आनन्दविभोर होकर एकमात्र यही कामना करते हैं कि उस महासत्ता पद पद्मों का षट् पद—'भौंरे ' की तरह मकरन्दपान करते रहें। षट्चक्रों की आराधना में निरन्तर संलग्नता का भाव भी 'षट्पद' शब्द में है। इस मा र्ग पर चलने वाले हर साधक को उपलब्ध आनन्द की अनुभूति करते हुए ऐसी ही आकांक्षा उमड़ती है।

13-श्लोक भावार्थ—हे माँ ! मेरे सभी वाक्य जप हों, हाथों की सभी क्रियाएँ मुद्रा हों, हर कदम प्रदक्षिणा हों, आहार के ग्रास आहुतियाँ हों, मेरे प्रणाम तुम में तादात्म्य हों, मेरे सभी सुख तुम्हारी अखिल आत्मा में समर्पित हों, हों मैं जो कुछ भी करूँ सो सभी तुम्हारी पूजा में गिने जाएँ।

संकेत; -

कुण्डलिनी शक्ति से उपलब्ध आत्मिक शक्ति एवं उत्कृष्ट विचारणा के आधार पर साधक की विचारणा तथा क्रिया देवोपम हो जाती है और उसके द्वारा सोचा गया प्रत्येक विचार, कार्य भगवान की आराधना जैसा ही मंगलमय होता है। मनुष्य शरीर में देवत्व का उदय करने में कुण्डलिनी शक्ति का अनुपम योगदान मिलता है। श्री शंकराचार्य ने बहुत कुछ पा लेने के बाद अंतिम रूप में यह माँगा है कि वे सर्वतोभावेन महाशक्ति में ही लीन हो जाएँ।संयम ही समस्त सिद्धियों का आधार है और संयम की प्रथम सीढ़ी है-वाचोगुप्ति अर्थात् 'वाणी का संयम'।

/////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////

''सौंदर्य लहरी''के श्लोक 1 से 16 का हिन्दी अनुवाद;-

शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि | अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति || 1 शिव को कल्याण का पर्याय ओर आदि देव माना गया है | उनके वाम विभाग ( दाहिने अंग ) मे गिरिजा शक्ति स्वरूपा हदय स्पंदन वत विध्यमान है |भगवान शिव शक्ति से युक्त हो कर ही समस्त सृष्टि का संचालन करने मे समर्थ हो पाते है | शिव शक्ति पुराक है ....!! शिव संकल्प हे तो शक्ति उसे पूर्ण करने की क्रिया शक्ति | परा शक्ति भगवती त्रिपुरासुंदरी राजराजेश्वरी ना हो , तो उन मे स्पंदन भी संभव नही | शिव त्र्यंबक कहे जाते है ... शक्तिहीन सृष्टि ,स्थिति , संहार का संतुलन नियमन रखने मे भी अपने आप को सामर्थ्यवान नही पाते |प्रकृति के बिना पुरुष मात्र कल्पना भर है | हे माँ ...जिनके अनेको जन्म जन्मांतर के पुण्य का उदय हुआ हो वही त्रिदेव ब्रम्हा ,विष्णु , महेश द्वारा आराध्य पूजनीय आपकी ‘श्री’ की स्तुति-पूजन-वंदन-आराधन करने का अधिकारी बन आपके श्री चरणो की धूल ( चरणधूलि-चरणों की रज ) प्राप्त कर सकता है | संकेत; -

इच्छा – ज्ञान – क्रिया ये तीन प्रकार की शक्ति मानी गयी है |इस त्रिगुणात्मिका शक्तिओ के बिना - हीन होकर स्वयं शिव भी कोई गति या कार्य करने मे समर्थ नही माने जाते |शिवशक्ति को एक दूसरे के पूरक माना गया हे तभी ये एकात्म स्वरूप से सारी लीलाए करने मे समर्थ हो पाते है |” शिव हं वाच्य है और शक्ति सः वाच्य “ ओर इस दोनों के भिन्न होने से क्रिया संभव ही नही |ये एकाकार हो तभी हं+सः = हंस: मंत्र सिद्ध होता है |जिसे उल्टा करने पर भी .... सोअहं रूप बनता है | ह ऑर स हादिविध्या के प्रथम दो अक्षर हे यही विशुद्ध ‘श्रीविद्या ’ का संकेत करते है | तनीयांसं पांसुं तव चरणपङ्केरुहभवं विरिञ्चिस्सञ्चिन्वन् विरचयति लोकानविकलम् | बहत्येनं शौरिः कथमपि सहस्रेण शिरसां हरस्संक्षुद्यैनं भजति भसितोद्धूलनविधिम् ||2 हे माँ ... उद्भव-स्थिति-संहार कारिणी ! आपके अति कोमल कमल समान श्रीचरणो के स्पर्श से दिव्य बनी धूल की रज की कृपा से ब्रम्हा निरंतर सृष्टि के नवसर्जन करने मे रत रहेते है | प्रतिपालक कहे जाते स्वयं विष्णु शेषवतार धारण कर अपने सहस्त्र सिरो से ... आप की श्रीचरण धुली से उत्पन्न समस्त लोक के प्रतिपालन का सामर्थ्य और दायित्व धारण करते है | सर्व संहारक स्वयं रुद्र आप की दिव्य चरण रज को ही अपने सर्वांग भस्म वत धारण कर लेपन करते है | ये त्रिदेव ब्रमहा , विष्णु , महेश तीनों मूर्ति पराशक्ति और आप के ‘श्री’ बीज का आराधन कर कृतकृत्य हो जाते है | आप की करुणा से ही सभी सामर्थ्य से संमपन्न बने रहेते है| संकेत; -

गति के भी तीन प्रकार माने गए हे मन – वाचा और देह | गति को क्रियात्मक स्वरूप देने मे चरण प्रमुख देह अवयव है | परा शक्ति की अद्भुत गति ‘स्पंदगति ‘ विद्या -अविद्या का रूप धारण करती है |उन्ही की गति ओर विक्षेप से अनंत सूक्ष्म अणु की सृष्टि हो कर उनसे अनंत ब्राम्हांड सूर्य आदि ग्रह , आकाश गंगा ,नक्षत्र आदि नभमण्डल का प्रादुर्भाव होता है |सप्त आकाश – सप्त पाताल मध्य मे भू लोक(मृत्यु लोक या ये प्राणी जगत ) का सर्जन और उसमे जीव सृष्टि का प्रारंभ होता है | मूल चेतना और इन्हे प्राण देकर स्पंदित बनाए रखने का सामर्थ्य आप के श्री चरणों की रज मात्र से प्रगट होता है |यही मूल चेतना का महात्म सर्व विदित है| अविद्यानामन्त-स्तिमिर-मिहिरद्वीपनगरी जडानां चैतन्य-स्तबक-मकरन्द-स्रुतिझरी | दरिद्राणां चिन्तामणिगुणनिका जन्मजलधौ निमग्नानां दंष्ट्रा मुररिपु-वराहस्य भवती || 3 सचराचर जगत मे अज्ञान रूपी अंधकार को ज्ञान और बुद्धि स्वरूप से नष्ट करने वाली मणिद्वीप नगरी का प्राग्ट्य आप के श्रीचरणो की धूल की रज से ही प्रगट होता है |अज्ञानियो के लिए आत्मज्ञान रूपी वांछितफल प्रदान करने वाले कल्पवृक्ष के पुनि से निकालने वाला पराग , अर्थहीन दरारीद्र्यो के लिए सकल संपत्ति का स्वामी बननेवाली चिंतामणि ये सभी और अन्य दुर्लभ मानेजाते इच्छित कामनाओ की पूर्ति के साधन आप ही का कृपा प्रसाद है |जैसे भवसागर मे डूबे हुये समस्त जीवो के उद्धार हेतु भगवान विष्णु के वराह स्वरूप के दो दंत ही उभरने का एक मात्र आश्रय है | संकेत ;-

विद्या के दो भेद हे - अविद्या और विद्या .. इन्ही को परा और अपरा कहा जाता है| चतुर्वेद ,छह वेदांग यह समस्त अपरा विद्या है |और जिस विद्या से ब्रह्म की प्राप्ति होती है उसे परा विद्या कहा जाता है| इसीलिए केवल वेद या शास्त्रो का ज्ञान रखनेवालो को विद्वान नहीं कहा जा सकता | ज्ञान से उत्पन्न ‘अहम’ का परित्याग कर सहज भाव से विनम्र ब्र्म्ह ज्ञान का जिज्ञासु मुमुक्ष ही परा विद्या का अधिकारी बनता है | समस्त इच्छित कामनाओ की पूर्ति करनेवाले माने गए सभी उत्तम साधन जैसे कल्पवृक्ष –चिंतामणि या कामधेनु आदि सभी माँ भगवती की ही कृपा प्रसादी है | त्वदन्यः पाणिभ्यामभयवरदो दैवतगणः त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया | भयात् त्रातुं दातुं फलमपि च वांचासमधिकं शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ || 4 समस्त चर अचर जगत का अंतिम आश्रय ओर शरणालय आप के श्री चरण है| हे माँ ... आप के तेज और चेतना से ही सामर्थ्य वान हो कर अन्य समस्त देवगण अभय या वरदमुद्रा प्रदर्शित कर अपने भक्तो को क्रमश: सभी भय से मुक्ति – सर्व संपदाओ से विभूषित होने का संकेत देते है | केवल आप ही हो जो अभयमुद्रा या आवश्यकता पूर्ति की वरद मुद्रा का प्रदर्शन (अभिनय) नही करते हो|क्योकि आप के श्री चरण की रज मात्र भी उतनी सामर्थ्यवान है| जिससे आप के शरणागत या आश्रित भक्त गण की अनेको जन्मजन्मांतर की सभी कामना , जन्म मरण रूप भवसागर से मुक्ति ,समस्त भय - व्याधि – त्रिविधताप का शमन और वांछित संपदाओ के उपभोग और मुक्ति की प्राप्ति की मंशा आप के चरण रज से ही परिपूर्ण हो जाती है | संकेत;-

ऐं – रीं – क्लीं...ये त्रिगुणत्मिका के दिव्य बीज मन्त्र माने जाते है | इनहि का आराधन वाग – चित्त और क्रिया का मूल उद्भव स्त्रोत माना गया है | श्री चक्र के मध्य मे त्रिकोण का स्वरूप इन्ही त्रिगुण शक्तिओ (महासरस्वती –वाग ,महालक्ष्मी –चित्त् ,महाकाली –क्रिया ) का निवास माना जाता है | जो सभी इच्छित कामनाओ की पूर्ति – भक्ति ओर अन्तः परम दुर्लभ मुक्ति भी प्रदान करते है | महादेवी की राजोपचार पूजन प्रणाली मे इन्ही त्रिगुणात्मिक दुर्गा का विविध उपचार प्रणाली से अराधन करने का “पात्रासादन “ से महा पूजन का प्रावधान देखा जाता है |अन्य देवी देवतो के आराधन से इच्छित कामना की या मुक्ति दोनो मे से एक् की ही पूर्ति संभव है|लेकिन केवल भागवती परांबा का श्रीचक्र अराधन ही भक्तो का कामनाओ की पूर्ति और मुक्ति दोनो प्रदान करता है... जो अति दुर्लभ माना जाता है | हरिस्त्वामाराध्य प्रणतजनसौभाग्यजननी नारी भूत्वा पुररिपुमपि क्षोभमनयत् | स्मरोऽपि त्वां नत्वा रतिनयनलेह्येन वपुषा मुनीनामप्यन्तः प्रभवति हि मोहाय महताम् || 5 आपका आराधन करनेवाले समस्त शरणागत भक्तो को सर्व सौभाग्य प्रदान करने वाली माँ .... समुद्र मंथन से उत्पन्न अमृत की प्राप्ति के विवाद का शमन करने हेतु स्वयं विष्णु ने आप का ही आराधन किया था और नारी का मोहिनी रूप धारण कर त्रिपुरसुर का वध करनेवाले भगवन शिव के मन मे भी क्षोभ उत्पन्न किया था | आप के काम बीज ‘क्लीं’ का अराधन कर के ही स्वयं काम देव स्वयं के सुखो का त्याग कर अपनी पत्नी रति के अधरो से चुंबित सुंदरतम देह से ग्र्विष्ठ होकर बड़े बड़े ज्ञानी ध्यानिओ की तपस्या मे उनके अन्तः करण मे संसार के प्रति मोह और कामासक्ति उत्पन्न करने की शक्ति प्राप्त करते हे | संकेत;-

प्रजनन के देवता कामदेव ने कादिका बीज ‘क्लीं’की उपासना की थी |कामदेव अपने आराधन से इतने समर्थ हो गए के सभी देव और ऋषिगण को मोहित और देह के प्रति आकर्षित कर जनित क्रियाओ मे रत रहने का चित्तभ्रम स्थापित करते है |माया बीज ‘रीं’ और काम बीज’ ‘क्लीं’ के योग से ही 'हलीं ब्लें' इस परम साध्य मंत्र का उद्धार है| यही सौभाग्य ,संतति और अन्य नानाविध इच्छाओ की पूर्ति करता है | धनुः पौष्पं मौर्वी मधुकरमयी पञ्च विशिखाः वसन्तः सामन्तो मलयमरुदायोधनरथः | तथाप्येकः सर्वं हिमगिरिसुते कामपि कृपां अपांगात्ते लब्ध्वा जगदिद-मनङ्गो विजयते || 6 हे हिमगिरिसु ते .... कामदेव का धनुष पुष्पो से बना हुआ है और प्रत्यंचा ( डोरी ) मधुर गुंजन करते भ्रमरो से गूँथी गयी है | पाँच विषय – रस , रूप ,गंध ,शब्द ,स्पर्श उनके पाँच तीर (काम बाण) है जो सुवासित पुष्पो के बने माने गए है |बसंत ऋतु उनका मंत्री और उनका रथ माल्यागीरी का मंदगति से चलने वाला , अति सुगंधित वायु है |और वे स्वयं अनंग ( शिवजी ने देह को भस्म कर दिया था तभी शरीर या देह रहित ) है| फिर भी वो इस परम दिव्य शस्त्रो को लेकर समस्त जगत को अकेला ही जीत लेता है |उस पर आप के आराधन के फल स्वरूप आपकी अनिर्वचनीय किंचित कृपा का ही ये फल है कि वो सर्वत्र विजयी होता है| संकेत;- काम से ककार , मलय से लकार ,मौर्वी से ई , और पुष्प से अनुस्वार लेकर कलीं का उच्चारण किया जाता है | कामभाव को साधना समाधि के लिए बड़ा विज्ञ माना जाता है |जो स्वयं शिव की समाधि मे भी विक्षेप कर सके उसकी प्रबलता सर्वविदित है |काम का क्षय विशुद्ध ब्रम्हज्ञान के उदय से ही संभव होता है | समान्यतः साधक को कामभाव से ग्रसित कर आराधन से दूर करने की मंशा काम मे देखी जाती है |इसीलिए सभी मुमुक्षो को भगवती परा का शरण लेना अनिवार्य माना जाता है ... माँ की कृपा और उन्ही के श्रीचरण का निरंतर ध्यान करने से काम का प्रभाव बलहीन होता देखा जाता है | क्वणत्काञ्चीदामा करिकलभकुम्भस्तननता परिक्षीणा मध्ये परिणतशरच्चन्द्रवदना | धनुर्बाणान् पाशं सृणिमपि दधाना करतलैः पुरस्तादास्तां नः पुरमथितुराहोपुरुषिका || 7 अपनी कटि प्रदेश ( कमर ) मे ‘कल-कल’ ध्वनि करने वाले घुंघरूओ से यूक्त मेखला धारण किए हुई ;हाथी के बच्चे के मस्तक पर स्थित कुंभो ( घड़ा ) के समान स्तनो के भार से थोड़ी झुककर खड़ी हुई , अत्यंत पतले कटि प्रदेश वाली , शरदृ ऋतु के पुर्णिमा के चंद्र के समान मुखवाली , हाथो मे ईख से बना हुआ धनुष ,विषय रूपी पाँच पुष्पबाण , राग रूपीपाश एवम क्रोध रूपी अंकुश इत्यादि धारण करने वाली तथा जाग्रत ,स्वप्न और सुसुप्ति रूपी त्रिपुर का संहार करनेवाले परम शिव के अहंकार स्वरूपिणी वह परम दिव्य परा शक्ति हमारे सामने ( ध्यान मे ) बिराजित रहे | संकेत;-

बाण से ब ,करतल से ल ,मथितु: से उ ओर आस्ता से अनुस्वार लेकर ‘ब्लुं’ बीज का ग्रहण किया जाता है | “रीं ब्लुं” इस बीज का जप आरधक को देवी का सायुज्य सुलभ् कराता है | सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे | शिवाकारे मञ्चे परमशिवपर्यङ्कनिलयां भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्दलहरीम् ||8 अमृत समुद्र के मध्य मे , सभी मनोरथों को पूर्ण करनेवाले कल्पवृक्षो की वाटिकाओ से घिरे हुये ,मणियो के द्वीप (पर्वत) मे ; नीप (कदंब) वृक्षो के उपवन के मध्य चिंतामणियो से निर्मित भुवन मे ;परममंगलरूपी रत्नजड़ित त्रिकोणाकृति मंच पर , परम शिव की गोद मे बिराजमान चिदानंद लहरी स्वरूप आप का ध्यान कोई विरल अनेक जन्मो के पुण्य से पुलकित जन ही कर सकता है | वे धन्य है|भगवती के भजन अराधन से चिदानंद की दिव्य तरंगो की जो अनुभूति होती है|ऐसे साधक अराधक अल्प ही होते है |जिन पर भगवती की ऐसी कृपा हो ..वे ही अपने अराधन मे सफल हुये माने जाते है | संकेत;-

शिवजी की गोद मे शक्ति को देखना.. ये कोई प्रणय मुद्रा ना समझ कर शिवशक्ति का एकात्म भाव देखना ही उचित माना जायेगा| महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि | मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वा कुलपथं सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसे ||9 मूलाधार चक्र मे पृथ्वी तत्व को ,एवं जल को भी मूलाधार चक्र मे ही ,मणिपुर चक्र मे अग्नि तत्व को जिसकी स्थिति स्वाधिष्ठान चक्र मे है |हदय स्थित अनाहत चक्र मे वायु तत्व को ,और उसके ऊपर विशुद्धि चक्र मे आकाश तत्व को और भौहों के ( भ्रमर) मध्य आज्ञा चक्र मे मन तत्व को |इस प्रकार सकल कुल पथ ( शक्ति के मार्ग ) सुषुम्ना मार्ग के द्वारा सभी चक्रो का भेदन कर के सहस्त्रदल वाले कमल मे अपने पति शिव से युक्त होकर विहार करती है|भेदन के समय शक्ति की गति मूलाधार से सहस्त्रार की ओर होती है |सहस्त्रार से नीचे उतरते समय वह नाड़ीयों को अमृत से सींचती हुई मूलाधार की ओर लौटती है | संकेत;-

पिछले श्लोक मे कुंडलिनी को जाग्रत होकर मूलाधार से सहस्त्रार यात्रा की अत्रेय भूमिका के दिव्य वर्ण के बाद इस श्लोक मे कुंडलिनी की प्रत्यावृत्त -भूमिका का वर्णन है |कु अर्थात पृथ्वी तत्व जहाँ लीन होता है उसे कुल कहते है ,वही आधार चक्र है |लक्षणा करने से सुषुम्णा मार्ग ही कुल है... यह सिद्धांत होता है |यही कौलमत का रहस्य भी है |सुषुम्णा के मूल मे कमल कनदाकार छिद्र मे विहारने वाली ही कुंडलिनी शक्ति है और वही परम दिव्य “श्री विद्या'' है | चतुर्भिः श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पञ्चभिरपि प्रभिन्नाभिः शम्भोर्नवभिरपि मूलप्रकृतिभिः | चतुश्चत्वारिंशद्वसुदलकलाश्रत्रिवलय त्रिरेखाभिः सार्धं तव शरणकोणाः परिणताः || 10 चार शिव चक्र ,उनसे भिन्न पाँच शिव युवतिया (शक्तिचक्र ) तथा प्रपंच के मूल कारण नौ तत्व से युक्त आपका निवास स्थान तिरलिस कणो का बना हुआ है |जो शंभु के बिन्दु स्थान से भिन्न है|वह अष्टदल , सोलहदल , तीन रेखाओ एवम तीन वृत्तो से युक्त है | संकेत;- ..!! सहस्त्रार चक्र मे रक्खे हुये आपके श्री चरणो के मध्य मे से जरनेवाली अमृत धाराओ की वर्षा से पञ्चमहाभूतो से रचित शरीर की समस्त नाड़िया ( प्रपंच ) को सींचती हुई अपने मूल स्थान मूलाधार को लौटकर अपना रूप सर्प के समान मंडलाकार मे परिवर्तित कर ( साढ़े तीन कुंडल ) डाल कर छोटे छिद्र वाले कुहर (गुफा) मे सोती है|सहस्त्रार से नीचे मूलाधार को उतारने को अन्वय भूमिका कहते है | संकेत;-

पिछले श्लोक मे कुंडलिनी को जाग्रत होकर मूलाधार से सहस्त्रार यात्रा की अत्रेय भूमिका के दिव्य वर्ण के बाद इस श्लोक मे कुंडलिनी की प्रत्यावृत्त -भूमिका का वर्णन है |कु अर्थात पृथ्वी तत्व जहाँ लीन होता है उसे कुल कहते है ,वही आधार चक्र है |लक्षणा करने से सुषुम्णा मार्ग ही कुल है... यह सिद्धांत होता है |यही कौलमत का रहस्य भी है |सुषुम्णा के मूल मे कमल कनदाकार छिद्र मे विहारने वाली ही कुंडलिनी शक्ति है और वही परम दिव्य “श्री विद्या'' है | चतुर्भिः श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पञ्चभिरपि प्रभिन्नाभिः शम्भोर्नवभिरपि मूलप्रकृतिभिः | चतुश्चत्वारिंशद्वसुदलकलाश्रत्रिवलय त्रिरेखाभिः सार्धं तव शरणकोणाः परिणताः |11 चार शिव चक्र ,उनसे भिन्न पाँच शिव युवतिया (शक्तिचक्र ) तथा प्रपंच के मूल कारण नौ तत्व से युक्त आपका निवास स्थान तिरलिस कणो का बना हुआ है |जो शंभु के बिन्दु स्थान से भिन्न है|वह अष्टदल , सोलहदल , तीन रेखाओ एवम तीन वृत्तो से युक्त है | संकेत;-

अति गुप्त श्रीचक्र ब्र्महांड ओर पिंड दोनों का प्रतिनिधित्व होता है |इसकी रचना चार शिव त्रिकोण और पाँच शक्तित्रिकोण के योग से होती है|शिव ओर शक्ति त्रिकोणो का मुख एक दूसरे से विपरीत होता है| श्रीयंत्र का लेखन दो प्रकार से होता है १- सृष्टिक्रम २- संहारक्रम|कौलाचार मे संहारक्रम होता है और समयाचार मे सृष्टिक्रम |यहाँ अभिप्राय ये है कि श्रीचक्र के मध्य मे ऊर्ध्व और अधो त्रिकोण का स्वरूप शिवशक्ति का ही निरूपण है | त्वदीयं सौन्दर्यं तुहिनगिरिकन्ये तुलयितुं कवीन्द्राः कल्पन्ते कथमपि विरिञ्चिप्रभृतयः | यदालोकौत्सुक्यादमरललना यान्ति मनसा तपोभिर्दुष्प्रापामपि गिरिशसायुज्यपदवीम् || 12 हे हिमवान की कन्या ... आप के सौंदर्य की उपमा देने के प्रयत्न मे ब्र्म्हाप्रभूति कविश्रेष्ठ इत्यादि कुछ-कुछ कल्पना किया करते है ,परंतु वे भी पूर्णतः सफल नहीं है |उस सौंदर्य की इच्छा (उत्सुकता) से स्वर्ग की अप्सराये भी ध्यानस्थ हो जाती है और परम शिव के नयनों के मध्य मे उनका दर्शन करने के लिए अनेकों कठिन तपस्याओ से प्राप्त होने वाले दुर्लभ शिव सायुज्य पदवी को मानसिक रूप से प्राप्त करती है| परम शिव के नेत्रो के अलावा अन्य नेत्रो के लिये परा शक्ति के सौंदर्य का आनंद लेना असंभव होने के कारण देवस्त्रीया शिव से आत्मसात हो जाने की अर्थात सायुज्य पदवी की इच्छा करती है | संकेत;-

ब्र्म्हा सृष्टि के कर्ता है इसलिये सर्व प्रथम कवि है |चतुर मुखो से वेदो का गान करते है | इसलिये सभी कवियों मे श्रेष्ठ है | परंतु वे भी भगवती की परम सौंदर्य की उपमा नहीं ढूंढ सके ...!! | इसलिये अन्य कवि तो केवल कल्पना ही कर सकते है | यदि अप्सरा आदि की उपमा दी जाए तो वे सभी भी भगवती का त्रिभुवन मोहन स्वरूप की ही समाधिस्थ हो कर आराधना करती है|यहाँ केवल शिव से युक्त होकर ही शक्ति का ऐक्य होना परम पदवी की उपलब्धि का ही गई है | केवल शिवजी ही कामासक्त नहीं है तभी वो जगदंबा के अनुपम सौन्दर्य के द्रष्टा माने गये है |बाकी अन्य देव गण माँ के रूप स्वरूप और सौन्दर्य का निरूपण करने मे सर्वथा असमर्थ देखे जाते है |माँ का नारी देह धारण किये होना केवल लीला मात्र है| शक्ति के अनंत स्वरूप है| यहाँ अन्य देव गण केवल नारी देह के भाव से ग्रसित हो कर कामासक्त होने के कारण देवी के दिव्य स्वरूप की महिमा समझने और वर्णन मे असमर्थ देखे जाते है | नरं वर्षीयांसं नयनविरसं नर्मसु जडं तवापाङ्गालोके पतितमनुधावन्ति शतशः | गलद्वेणीबन्धाः कुचकलशविस्रस्तसिचया हठात् त्रुट्यत्काञ्च्यो विगलितदुकूला युवतयः || 13 वृद्धावस्था को प्राप्त , देखने मे कुरूप ,प्रेमक्रीडा से अज्ञान पुरुष भी आप की कृपा द्रष्टि पड़ने मात्र से ऐसा रमणीय ( सुंदर ) हो जाता है कि सैकड़ों की संख्या मे युवतिया “ जिनके केश बिखरे हुये है , कूच –कलशों ( स्तनो ) से वस्त्र फिसल गए है ,जिनकी मेखलाए जबरन टूट गई है और जिनकी साड़ी ( वस्त्र –उपवसत्र ) शरीर पर से उतरी जा रही है |ऐसी अति सुंदरतम युवतिया भी जो पहले कुरूप था अब उसके पीछे गिरते – पड़ते भागने लगती है |अतः स्त्रीरूप मे जिन शक्तिओ का वर्णन किया जाता है वे उससे आकर्षित होती है | संकेत;-

यहा स्थूल कामुक भाव का वर्णन नहीं ....योग दर्शन के अनुसार रूपलावण्य ,बल ओर शरीर का वज्रवत सुगठित होना कायसंपत कहा जाता है |भूतजय से अणिमादि सिद्धियो की भी प्राप्ति होती है |प्रत्येक नाड़ियो मे अमृत का संचार होने का फल यही कायसंपत है |ऊर्ध्वरेता मनुष्य के शरीर की रसोत्पादकता बढ़ जाने से निर्माण शक्ति का हास बंध हो जाता है और स्नायुओ मे जीवन शक्ति का संचार होकर सातो धातुओ का विधिवत पुनः निर्माण होने लगता है |जैसे समस्त शरीर का रक्त हदय की ओर गति करता है|वैसे ही यहाँ युवतियो का दौड़ कर आने की उपमा भर समझना उचित माना जायेगा | क्षितौ षट्पञ्चाशद् द्विसमधिकपञ्चाशदुदके हुताशे द्वाषष्टिश्चतुरधिकपञ्चाशदनिले . दिवि द्विष्षट्त्रिंशन्मनसि च चतुष्षष्टिरिति ये मयूखास्तेषामप्युपरि तव पादाम्बुजयुगम् ||14 पृथ्वीतत्वरूपी मूलाधार मे 46 , जलतत्वरूपी मणिपुरचक्र मे 52, अग्नितत्वरूपी स्वाधिष्ठान मे 62, वायुतत्वरूपी अनाहद मे 54,आकाशतत्व से युक्त विशुद्द मे 62 , तथा मनतत्वरूपी आज्ञाचक्र मे जो 64 मयूख (किरण) है| उन सभी के ऊपर आप के श्री चरण कमल है | उपरोक्त किरणे छः चक्रो से संबंध रखने वाले तत्वो की है और इन छहों चक्रो से ऊपर (आज्ञाचक्र) के ऊपर भगवती के श्रीचरण युगल शोभित होते है |सभी किरणों को सुषुम्ना मार्ग मे लीन करते हुये ( छःचक्रो ) का अतिक्रमण करते हुए आज्ञाचक्र के ऊपर अर्थात माँ भगवती के श्री चरणो तक पंहुचा जा सकता है | संकेत;-

भगवती राजराजेश्वरी, त्रिपुरासुंदरी के श्री चरण आज्ञाचक्र के ऊपर बिराजित है| यहाँ आराधना मार्ग का सुंदर निरूपण किया गया है| आध्यात्म मार्ग मे माँ के सायुज्य के इच्छुक साधक की क्रमश: सभी कामना, इच्छा और स्थूल देहभाव की आसक्तिओ का परित्याग कर एक एक चक्र मे आगे बढ़ते हुये भोग -विलास -काम का निर्मूलन होते ही देवी का शरण सहज होने का निर्देश समझाया गया है| शरज्ज्योत्स्नाशुद्धां शशियुतजटाजूटमुकुटां वरत्रासत्राणस्फटिकघुटिकापुस्तककराम् | सकृन्नत्वां नत्वा कथमिव सतां संन्निदधते मधुक्षीरद्राक्षामधुरिमधुरीणाः कणितयः || 15 शरद पुर्णिमा की चन्द्रिका ( चाँदनी ) के समान स्वछ , निर्मल , धवल वर्णो वाली तथा द्वितीय के चंद्रमा युक्त जटाजूट रूपी मुकुटो से सुशोभित , अपने दोनों हस्त मे वरदमुद्रा एवम सभी भय से मुक्ति की अभयमुद्रा को प्रदर्शित किए हुये तथा दोनों कर कमलो मे ,एक मे अति दिव्य विशुद्ध स्फटिक मणियो की माला एवम दूसरे मे पुस्तक धारण किए हुये है |ऐसे आप के सौम्य स्वरूप का एक बार भी वंदना ना करने वाले मनुष्य को मधु , दूध एवम द्राक्षा के मिश्रण समान मधुर कविता करने की शक्ति केसे प्राप्त होगी ...?? संकेत;-

ऋग्वेद के अनुसार वर्णमयी सरस्वती चतुरपद वाली होती है जिसे विद्वान वेदज्ञ ब्राह्मण आराधते है | उनमे से तीन परा , पश्यन्ति और मध्यमा गुहा मे निहित है और चौथी वैखरी को मनुष्य वाचा प्रयोजन बोलते है | इस मंत्र के साथ सरस्वती के बीज ‘ऐं’ की उपासना की जाती है | यहाँ भाव ये बताया गया है कि माँ शारदा का आराधन नहीं करने वाला साधक बिना ज्ञान या भक्ति के माँ भगवती की अनंत महिमा को केसे समझ सकेगा | माँ त्रिगुणत्मिका है और त्रिविद्या होने के कारण उनके स्वरूप मे शारदा ज्ञान और बुद्धि प्रदान करने का स्त्रोत समझाया गया है| कवीन्द्राणां चेतःकमलवनबालातपरुचिं भजन्ते ये सन्तः कतिचिदरुणामेव भवतीम् | विरिञ्चिप्रेयस्यास्तरुणतरशृङ्गारलहरी गभीराभिर्वाग्भिर्विदधति सतांरञ्जनममी || 16 कवि चक्रवर्तियों के चित्तरूपी कमल वन को विकसित करने के लिए उदित होते सूर्य के समान ‘अरुणा ‘ नाम से आपको संबोधित करते है|आपका जो कोई महान पुरुष आप का भजन करते है|वे ब्र्म्हाजी की प्रिया (सरस्वती) की समृद्धि तरुणतर श्रुंगाररस की धारा जैसी गंभीर कविताओ द्वारा ओजस्वी वाक शक्ति के द्वारा सज्जन पुरुष माँ भगवती का मनोरंजन किया करते है|इस रूप मे देवी की आराधना करने वाले पुरुषो को श्रुंगार रस से युक्त कविताओ की रचना करने की सामर्थ्य शक्ति प्राप्त होती है|कवियों के चित्त रूपी कमल वन को विकसित करने के लिए अरुणादेवी बालाभगवती सूर्य के समान है| ... SHIVOHAM...