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क्या है आदि शंकर द्वारा लिखित ''सौंदर्य लहरी''की महिमा ?


ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

अर्थ :'' हे! परमेश्वर ,हम शिष्य और आचार्य दोनों की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों (गुरू और शिष्य) को साथ-साथ विद्या के फल का भोग कराए। हम दोनों एकसाथ मिलकर विद्या प्राप्ति का सामर्थ्य प्राप्त करें। हम दोनों का पढ़ा हुआ तेजस्वी हो। हम दोनों परस्पर द्वेष न करें''।

''सौंदर्य लहरी''की महिमा ;-

17 FACTS;-

1-सौंदर्य लहरी (संस्कृत: सौन्दरयलहरी) जिसका अर्थ है “सौंदर्य की लहरें” ऋषि आदि शंकर द्वारा लिखित संस्कृत में एक प्रसिद्ध साहित्यिक कृति है। कुछ लोगों का मानना है कि पहला भाग “आनंद लहरी” मेरु पर्वत पर स्वयं गणेश (या पुष्पदंत द्वारा) द्वारा उकेरा गया था। शंकर के शिक्षक गोविंद भगवदपाद के शिक्षक ऋषि गौड़पाद ने पुष्पदंत के लेखन को याद किया जिसे आदि शंकराचार्य तक ले जाया गया था। इसके एक सौ तीन श्लोक (छंद) शिव की पत्नी देवी पार्वती / दक्षिणायनी की सुंदरता, कृपा और उदारता की प्रशंसा करते हैं।सौन्दर्यलहरी/शाब्दिक अर्थ सौन्दर्य का सागर आदि शंकराचार्य तथा पुष्पदन्त द्वारा संस्कृत में रचित महान साहित्यिक कृति है।इसमें माँ पार्वती के सौन्दर्य, कृपा का १०३ श्लोकों में वर्णन है।भगवत्पाद शंकराचार्य की सौन्दर्यलहरी प्रथम तान्त्रिक रचना है जिसमें सौ श्लोकों के माध्यम से आचार्य शंकर ने भगवती पराशक्ति पराम्बा त्रिपुरसुन्दरी की कादि एवं हादि साधानाओं के गोप्य रहस्यों का उद्यघाटन किया है और पराशक्ति भगवती के अध्यात्मोन्मुख अप्रतिम सौन्दर्य का वर्णन किया है।ये त्रिपुर-सुंदरी रूप की उपासना का ग्रन्थ है इसलिए भी सौन्दर्यलहरी है।

2-भगवत्पाद ने सौन्दर्यलहरी की रचना कर भगवती के स्तवन से श्रीविद्या की उपासना एवं महिमा, विधि, मन्त्र, श्रीचक्र एवं षट्चक्रों से उनका सम्बन्ध तथा उन षट्चक्रों के वेधरूपी ज्ञान के प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया है।सौन्दर्यलहरी में कुल सौ श्लोक हैं, जिनमें से आदि के इकतालिस श्लोक आनन्दलहरी के नाम से प्रसिद्ध हैं। शेष उनसठ श्लोकों में देवी के सौन्दर्य का नखशिख वर्णन है। वस्तुत: 'आनन्द' ब्रह्मा का स्वरूप है जिसका ज्ञान हमें भगवती करा देती है। अत: ब्रह्मा के स्वरूप 'आनन्द' को बताने वाली भगवती उमा के स्वरूप का प्रतिपादन शेष उनसठ श्लोकों में वर्णित है।तंत्र में कई यंत्र भी प्रयोग में आते हैं। ऐसे यंत्रों में सबसे आसानी से शायद श्री यंत्र को पहचाना जा सकता है।

3-सौन्दर्यलहरी के 32-33वें श्लोक इसी श्री यंत्र से जुड़े हैं। साधकों के लिए इस ग्रन्थ का हर श्लोक किसी न किसी यंत्र से जुड़ा है, जिसमें से कुछ आम लोगों के लिए भी परिचित हैं, कुछ विशेष हैं, सबको मालूम नहीं होते। शिव और शक्ति के बीच कोई भेद न होने के कारण ये अद्वैत का ग्रन्थ भी होता है। ये त्रिपुर-सुंदरी रूप की उपासना का ग्रन्थ है इसलिए भी सौन्दर्य लहरी है। कई श्लोकों में माता सृष्टि और विनाश का आदेश देने की क्षमता के रूप में विद्यमान हैं।सौन्दर्यलहरी केवल काव्य ही नहीं है, यह तंत्रग्रन्थ है। जिसमें पूजा, यन्त्र तथा भक्ति की तांत्रिक विधि का वर्णन है। इसके दो भाग हैं-

आनन्दलहरी - श्लोक १ से ४१

सौन्दर्यलहरी - श्लोक ४२ से १०३

4-एक बार ऐसा कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य शिव और पार्वती की पूजा करने के लिए कैलाश गए थे। वहां, भगवान ने उन्हें १०० श्लोकों वाली एक पांडुलिपि दी, जिसमें देवी के कई पहलुओं को उन्हें उपहार के रूप में वर्णित किया गया था। जब शंकर कैलाश के दर्शन कर लौट रहे थे, तब नंदी ने उन्हें रास्ते में रोक दिया। उसने उससे पांडुलिपि छीन ली, उसे दो भागों में फाड़ दिया, एक भाग लिया और दूसरा शंकर को दे दिया। शंकर, शिव के पास दौड़े और उन्हें घटना सुनाई। शिव ने मुस्कुराते हुए, उन्हें १०० छंदों के प्रारंभिक भाग के रूप में ४१ छंदों को अपने साथ रखने की आज्ञा दी और फिर, देवी की स्तुति में अतिरिक्त ५९ छंद लिखने की आज्ञा दी। इस प्रकार, श्लोक १-४१ भगवान शिव की मूल कृति है, जो तंत्र, यंत्र और विभिन्न शक्तिशाली मंत्रों के प्राचीन अनुष्ठानों पर बहुत प्रकाश डालते हैं।आदि शंकराचार्य ने सौंदर्य लहरी में कहा-चतुर्भि: श्रीकंठे: शिवयुवतिभि: पश्चभिरपि ../नवचक्रों से बने इस यंत्र में चार शिव चक्र, पांच शक्ति चक्र होते हैं।

5-श्लोक १-४१ शिव और शक्ति के मिलन और संबंधित घटनाओं के रहस्यमय अनुभव का वर्णन करता है। शेष श्लोक अर्थात 42-100 की रचना स्वयं आदि शंकर ने की है, जो मुख्य रूप से देवी के स्वरूप पर केंद्रित हैं।सभी १०० श्लोकों को सामूहिक रूप से 'सौंदर्य लहरी' के रूप में जाना जाता है। सौंदर्य लहरी केवल एक कविता नहीं है। यह एक तंत्र पाठ्यपुस्तक है, जिसमें पूजा और प्रसाद, कई यंत्र, प्रत्येक श्लोक के लिए लगभग एक निर्देश दिया गया है; प्रत्येक विशिष्ट श्लोक से जुड़ी भक्ति करने की तंत्र तकनीक का वर्णन करना; और उससे होने वाले परिणामों का विवरण देता है।श्लोक 42-100 अधिक सीधे हैं; वे देवी की शारीरिक सुंदरता का वर्णन करते हैं और कभी-कभी उन्हें सौंदर्य लहरी भी कहा जाता है। 6-कुंडलिनी की अवधारणा;- पहले ४१ श्लोकों में माता की आंतरिक पूजा का विस्तृत विवरण दिया गया है। इसमें कुंडलिनी , श्री चक्र , मंत्र (श्लोक ३२, ३३) की अवधारणा की व्यवस्थित व्याख्या शामिल है। यह सर्वोच्च वास्तविकता को अद्वैत के रूप में दर्शाता है लेकिन शिव और शक्ति, शक्ति धारक और शक्ति, होने और इच्छा के बीच अंतर के साथ। शक्ति, अर्थात् , माता या महा त्रिपुर सुंदरी , प्रमुख कारक बन जाती है और शक्ति धारक या शिव एक आधार बन जाते हैं। प्रथम श्लोक में ही इस विचार का स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है। "शक्ति के साथ संयुक्त, शिव बनाने की शक्ति के साथ संपन्न है, या अन्यथा, वह एक आंदोलन भी करने में असमर्थ है।"इसी विचार को श्लोक 24 में लाया गया है, "ब्रह्मा ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं, विष्णु पालन करते हैं, रुद्र नष्ट करते हैं, और महेश्वर हर चीज को अवशोषित करते हैं और सदाशिव में आत्मसात करते हैं। आपकी लता जैसे भौंहों से जनादेश प्राप्त करने पर, सदाशिव सब कुछ पिछले की तरह गतिविधि में पुनर्स्थापित करता है चक्र।" माता की ऐसी प्रधानता श्लोक ३४ और ३५ में भी देखी जा सकती है।

7-सौन्दर्य लहरी आदि शंकर की अप्रतिम सर्जना का अन्यतम उदाहरण है। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ।पुरानी मान्‍यता है कि जब एक ही जगह पर, एक ही स्‍वर में, एकजुट होकर मंत्र का जाप किया जाए तो उस जगह ऊर्जा का ऐसा चक्र निर्मित होता है, जो मनमंदिर, शरीर, आत्‍मा सभी को अपनी परिधि में ले लेता है। नाद-ब्रह्म की कल्‍पना हमारे यहां उसी संदर्भ में स्‍वीकृत की गई है। आधुनिक विज्ञान भी नाद-ब्रह्म के सामर्थ्‍य का, मंत्रों के उच्‍चारण की ताकत का इन्‍कार नहीं करता है।सौन्‍दर्य लहरी के अदभुत पाठ से पूरे वातावरण में ऊर्जा महसूस होता है।एक दिव्‍य अनुभूति ...जिसमें रस भी है, रहस्‍य भी है और ईश्‍वर के साथ रम जाने की अदम्‍य इच्‍छा भी है।सौन्‍दर्य लहरी के हर मंत्र में एक अलग शक्ति है, एक अलग भाव है।उत्तर भारत में जैसे दुर्गा-सप्तशती का पाठ होता है वैसे ही दक्षिण में सौन्दर्यलहरी का पाठ होता है।शिव और शक्ति के अभेद तथा परस्पर अपेक्षिता तथा शक्ति के कल्याणकारी स्वरूप का दर्शन सौन्दर्यलहरी में जिस प्रकार से प्राप्त होता हैं; वैसे अन्यत्र कहीं नहीं हैं।

8-भगवान् शंकराचार्य ने अपनी शक्ति-साधना के अनुभवों की हलकी-सी झाँकी सौंदर्य लहरी में प्रस्तुत की है। शक्ति के बिना शिव की प्राप्ति नहीं हो सकती। उपनिषद्कार के अनुसार यह आत्मा बलहीनों को प्राप्त नहीं होती। दुर्बलता के रहते ब्रह्म तक पहुँच सकने की क्षमता कहाँ से आ सकती है। इस दृष्टि से ब्रह्मविद्या के सहारे ब्रह्मवेत्ता बनने और ब्रह्मतत्व को प्राप्त करने के प्रयत्न में भगवान् शंकराचार्य को शक्ति-साधना करनी पड़ी। और इसके लिए योगाभ्यास के—प्रत्याहार,धारणा, ध्यान, समाधि के प्रयोग ही पर्याप्त नहीं रहे, वरन् उन्हें पंच-तत्वों की प्रवृत्ति का संचार और नियंत्रित कर्तीृ अपराविद्या का अवलम्बन लेकर शरीर और मन को भी समर्थ बनाना पड़ा। इस प्रयोजन के अपराविद्या की साधना में कुंडलिनी शक्ति को प्रमुख माना जाता रहा है। इसे कामकला या काम-बीज भी कहते हैं। प्रजनन प्रयोजन में भी यह कला प्रयुक्त होती है और उसका जननेन्द्रिय के गुह्य क्रियाकलापों से भी संबंध है, इसलिये उसे गोपनीय गिन लिया जाता है और उसकी चर्चा अश्लील मानी जाती है, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं।

9-अश्लील कोई अवयव या कोई क्रियाकलाप नहीं। प्रजनन को अपने यहाँ एक धर्म कृत्य माना गया है। सोलह संस्कारों में गर्भाधान भी एक संस्कार है। जिसकी पृष्ठभूमि धर्मकृत्यों के देवता और गुरुजनों के आशीर्वाद के साथ विनिर्मित की जाती है। भगवान् शिव का प्रतीक विग्रह जननेन्द्रिय के रूप में ही है, जिसे धर्मभावना और श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। निन्दनीय वह प्रक्रिया ही हो सकती है, जिसके द्वारा पशुप्रवृत्ति को भड़काने में सहायता मिले। शंकराचार्य ने भारती के प्रश्नों को यह कहकर टाला नहीं कि हम संन्यासी हैं, हमें 'कामविद्या' के संदर्भ में कुछ जानना या बताना क्या आवश्यक है? वे जानते थे कि योग परा और अपराविद्या के सम्मिश्रण का नाम है। परा अर्थात् ब्रह्मविद्या ज्ञान-विद्या अपरा अर्थात् शक्तिविद्या आत्मवेत्ता को दोनों ही जाननी चाहिए।

10-जो शक्ति है, उसके सदुपयोग-दुरुपयोग की जानकारी होना भी आवश्यक है। शरीर के क्रिया-कलाप और मन के उल्लास, जिस सूक्ष्म शक्ति से प्रेरित, प्रोत्साहित और कर्म प्रवृत्त होते हैं, उस कुण्डलिनी शक्ति को उपेक्षा में नहीं डाला जा सकता। इस उपेक्षा से विकृतियाँ उत्पन्न होने और सदुपयोग की अनभिज्ञता से अहित ही हो सकता है। इसलिए गृहस्थ, ब्रह्मचारी सभी के लिए उसे जानना आवश्यक है।मस्तिष्क के मध्य ब्रह्मरंध्र में 'ज्ञानबीज' और जननेन्द्रिय मूल में 'कामबीज' स्थित हैं। कामबीज को नारी की 'योनि' की संज्ञा दी जाती है और ज्ञानबीज को 'शिश्न' की। यह मात्र आकर्षक कल्पना ही नहीं; इसमें वैज्ञानिक तथ्य भी हैं। उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव की तरह यह दो अत्यंत सामर्थ्यवान् प्रचण्ड क्षमताओं से परिपूर्ण दो शक्ति-संस्थान विद्यमान हैं। मस्तिष्क का सदुपयोग जानने और करने वाले व्यक्ति जिस प्रकार भौतिक और आत्मिक प्रगति कर सकते हैं, उसी प्रकार कामशक्ति कुंडलिनी का सदुपयोग करके भी जीवन के हर क्षेत्र में उत्साह और उल्लास विकसित किया जा सकता है। न केवल शरीर और मन के विकास के लिए, न केवल भौतिक सफलताएँ, समर्थताएँ प्राप्त करने के लिए, वरन् आत्मिक और भावनात्मक प्रगति के लिए इस शक्ति की प्रक्रिया का ज्ञान एवं अनुभव होना आवश्यक है।

11-अध्यात्म शास्त्रों में कुण्डलिनी के संबंध में बहुत कुछ बताया गया है।योग राजोपनिषद केअनुसारअपान स्थल मूलाधार में कंद है। उसे कामरूप-कामबीज कहते हैं। उसे ही वह्नि कुण्ड अथवा कुण्डलिनी तत्त्व कहते हैं। वायु पुराण केअनुसार जीव ने ब्रह्म से कहा। आप बीज हैं, मैं योनि हूँ। यह क्रम सनातन है । कुंडलिनी स्थान पर अधोलिंग का, शिखा स्थान पर पश्चिम लिंग का और भृकुटियों के मध्य ज्योतिर्लिंग का ध्यान करना चाहिए। प्रकृति का प्रतिनिधित्व करने वाला केन्द्र है— जननेन्द्रिय मूल—कुण्डलिनी चक्र। और पुरुष का मनुष्य शरीर से मस्तिष्क के मध्य ब्रह्मरन्ध्र—सहस्रार चक्र में अवस्थित है। जब तक दोनों का मिलन नहीं होता, बिजली की दो धा राएँ-पृथक-पृथक रहने की तरह मानव जीवन में भी सब कुछ सूना रहता है। पर जब इन दोनों शक्ति केन्द्रों का परस्पर संबंध-समन्वय-सहचर्य आरंभ हो जाता है तो ग्रीष्म और शीत के मिलने पर आने वाले बसन्त की तरह जीवन उद्यान भी पुष्प-पल्लवों से भर जाता है। इसी प्रयत्न के किए जाने वाले प्रयोग को कुण्डलिनी जागरण कहते हैं।

12-शंकराचार्य के ज्ञान और अनुभव में यही कमी देखकर भारती ने उनकी साधना-अपूर्णता को चुनौती दी थी और शास्त्रार्थ के लिए ललकारा था। काम केन्द्र में स्फुरणा बड़ी सरस और कोमल है। समस्त कलाएँ और प्रतिभाएँ वहीं पर केन्द्रीभूत हैं। जो लोग उस सामर्थ्य को मैथुन प्रयोजन के तुच्छ क्रीड़ा -कल्लोल में खर्च करते रहते हैं, वे उन दिव्य विभूतियों से वंचित रह जाते हैं जो इस कामशक्ति को सृजनात्मक दिशा में मोड़कर उपलब्ध की जा सकती हैं। आत्मविद्या के ज्ञाता इस कामशक्ति को न तो हेय मानते हैं और न तिरस्कृत करते हैं, वरन् उसके स्वरूप, उपयोग को समझने और सृजनात्मक प्रयोजन के लिए प्रयुक्त करने के लिए सचेष्ट होते हैं।ब्रह्म को शिव और प्रकृति को शक्ति कहते हैं। इन दोनों के मिलन का अतीव सुखद परिणाम होता है। ब्रह्मरन्ध्र में अवस्थित और ज्ञानबीज और जननेन्द्रिय मूल में सन्निहित कामबीज का मिलन भी जब संभव हो जाता है, तो बाह्य और आन्तरिक जीवन में आनन्द, उल्लास का ठिकाना नहीं रहता है।

13-ब्रह्मानन्द की तुलना मोटे अर्थ में विषयानन्द से की जाती रही है। यह अन्ततः शक्तियों का मिलन भी अलंकारिक भाषा में ब्रह्ममैथुन कहा जाता है। कुण्डलिनी-साधना की जब प्राप्ति होती है तो इस स्तर का आनन्द भी साधक को सहज ही मिलने लगता है।योगिनी तंत्र के अनुसार ''हे पार्वती, सहस्रकमल में जो कुल और कुण्डलिनी—महासर्प और महासर्पिणी का मिलन है। उसी को यतियों ने परम मैथुन कहा है। तंत्र सार के अनुसार आत्मा को परब्रह्म के साथ प्रगाढ़ आलिंगन में आबद्ध करके परम रस में निमग्न रहना ..यही यतियों का मैथुन है ; कामसेवन नहीं। इड़ा, सुषुम्ना और जीवात्म